Shri Narsimha Chaturdashi - 30 Apr 2026
हर परिस्थिति में दिव्य आश्रय — नरसिंह चतुर्दशी का महत्त्व
इतो नृसिंहः परतो नृसिंहः
यतो यामि ततो नृसिंहः।
बहिर् नृसिंहो हृदये नृसिंहो
नृसिंहम् आदिम् शरणं प्रपद्ये॥
भावार्थ:
भगवान नृसिंहदेव सर्वत्र विराजमान हैं—बाहर भी और भीतर भी। हम जहाँ भी जाते हैं, वे हमारे साथ रहते हैं। वे हमारे हृदय के अंतरतम में भी स्थित हैं। ऐसे आदि पुरुष भगवान नृसिंहदेव की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।
दिव्य करुणा और रक्षा का अद्भुत प्रकट्य
नरसिंह चतुर्दशी हमें यह स्मरण कराती है कि भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं।
यह केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि भक्त और भगवान के बीच के अटूट प्रेम और विश्वास का जीवंत उदाहरण है।
हिरण्यकशिपु, जो अपने अहंकार और शक्ति के मद में चूर था, उसने अपने ही पुत्र प्रह्लाद महाराज को अनेक कष्ट दिए—अग्नि, विष, हाथी, शस्त्र—सब कुछ प्रयुक्त किया गया।
परंतु प्रह्लाद महाराज का हृदय केवल भगवान श्री हरि के स्मरण में स्थिर था।
जब हिरण्यकशिपु ने क्रोध में आकर स्तंभ पर प्रहार किया और भगवान की उपस्थिति को चुनौती दी, तब भगवान ने उस स्तंभ से प्रकट होकर यह सिद्ध किया—
भगवान हर जगह हैं और अपने भक्त की रक्षा अवश्य करते हैं।
अद्भुत स्वरूप — न मनुष्य, न पशु
भगवान नृसिंहदेव का रूप अद्वितीय है—आधा मनुष्य, आधा सिंह।
यह स्वरूप इस बात का प्रतीक है कि भगवान किसी भी परिस्थिति में अपने भक्त की रक्षा करने के लिए किसी भी रूप में प्रकट हो सकते हैं।
उन्होंने संध्या समय, द्वार पर, अपनी गोद में बैठाकर हिरण्यकशिपु का वध किया—इस प्रकार ब्रह्मा जी के वरदान की प्रत्येक शर्त को पूर्ण करते हुए।
जहाँ दुष्टों के लिए वे भय और विनाश के प्रतीक हैं, वहीं अपने भक्त प्रह्लाद के लिए वही भगवान अत्यंत करुणामय और स्नेहपूर्ण हैं।
हमारे हृदय के राक्षसों का नाश
नरसिंह चतुर्दशी का उत्सव केवल बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक साधना का भी अवसर है।
हम भगवान से प्रार्थना करते हैं कि वे हमारे हृदय में प्रकट होकर इन आंतरिक बाधाओं को दूर करें:
अहंकार और झूठी प्रतिष्ठा
क्रोध और ईर्ष्या
कामनाएँ और भौतिक आसक्तियाँ
भगवान नृसिंहदेव की कृपा से हमारा हृदय शुद्ध हो और हम शुद्ध भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ सकें।
ISKCON Vesu में नरसिंह चतुर्दशी उत्सव
ISKCON Vesu में यह पावन उत्सव अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है।
विशेष आकर्षण:
उपवास और संकल्प
भक्तगण गोधूलि बेला तक उपवास रखते हैं, उसी समय जब भगवान ने प्रह्लाद की रक्षा की थी।
हरिकथा एवं श्रवण
श्रीमद् भागवतम् से प्रह्लाद महाराज की लीलाओं का श्रवण, जो हमें दृढ़ भक्ति की प्रेरणा देता है।
हरिनाम संकीर्तन
उत्साहपूर्ण कीर्तन के माध्यम से भगवान के पवित्र नामों का स्मरण।
सेवा के अवसर
अभिषेक, प्रसाद वितरण, एवं मंदिर सेवा में भाग लेकर भगवान की कृपा प्राप्त करें।
शरणागति का आह्वान
आइए, इस पावन अवसर पर हम सभी अपने जीवन की सभी बाधाओं को दूर करने वाले, अपने परम रक्षक भगवान नृसिंहदेव के चरणों में पूर्ण समर्पण करें।
उनकी कृपा से ही हमें सच्ची शांति, सुरक्षा और भक्ति प्राप्त होती है।
श्री नृसिंहदेव भगवान की जय!
प्रह्लाद महाराज की जय!
श्रील प्रभुपाद की जय!