International Society for Krishna Consciousness

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Boat Festival - 03 May 2026

नौका विहार

नौका विहार - भगवान कृष्ण और श्रीमती राधारानी की दिव्य लीलाओं के उत्सव के रूप में मनाया जाता है।

विशेष रूप से वृंदावन, मायापुर और कई अन्य इस्कॉन मंदिरों में यह प्रमुख त्योहार माना जाता है ।

लीला का स्मरण -

यह उत्सव हमें शास्त्रों में वर्णित,वृंदावन की मधुर लीलाओं का स्मरण करता है जो भगवान कृष्ण, राधा रानी और गोपियों के साथ किया करते थे। कृष्ण ने एक बार केवट बनकर राधा रानी और गोपियों को यमुना पार कराया था।

राधा रानी गोपियों के साथ एक बार जब दूध और दही बेचने के लिए यमुना पार जा रही थी, तब कृष्ण केवट बनकर अपनी नाव लेकर आते हैं और उन्हें अपने नाव में बैठाते हैं। बीच मझधार में ले जाकर कृष्ण ने अपनी नाव को हिलाया ( डूबने का नाटक किया) और उनसे कहा कि मेरी नाव में छेद हो गया है ,तुम अपना दही और दूध नदी में फेंक दो,नाव इतना भार उठा नहीं पाएगी। वे सब घबरा गई और उन्होंने कहा - कैसे भी करके हमारे प्राण बचा लो, हम तुम्हारी सब बात मानेंगे।

अंत में श्रीमती राधारानी कृष्ण को पहचान गई।

आध्यात्मिक प्रतीक-

इस्कॉन के उपदेशों के अनुसार नौका विहार केवल एक उत्सव नहीं बल्कि गहरा संदेश भी देता है।

भगवत गीता और श्रीमद् भागवत में कई कई स्थानों पर भगवान के चरणों की, भगवान द्वारा दिए गए दिव्य ज्ञान की और कहीं कहीं पर मनुष्य शरीर की तुलना भी नाव से की गई है ।

पर यह जो नौका विहार का उत्सव है इसके आधार पर हम समझ सकते हैं कि भगवान के चरण कमल नाव के समान है, हमारा आश्रय हैं ,और उनके आश्रय से हम इस भवसागर को पार कर सकते हैं।

जैसा की श्रीमद् भागवत के १०.१४.५८ श्लोक में बताया गया है-

"समाश्रिता ये पद पल्लव प्लवम, महदपदम पुण्य यशो मुरारे , भवामबुद्धिर व्यापदम परम पदम, पदम पदम यत विपदाम न तेशाम "

दृश्य जगत के आश्रय एवं मूर राक्षस के शत्रु, मुरारी के नाम से प्रसिद्ध भगवान के चरण कमल रूपी नाव को जिन्होंने स्वीकार किया है उनके लिए यह भवसागर बछड़े के खूर चिन्ह में भरे जल के समान है। उसका लक्ष्य "परम पदम" अर्थात बैकुंठ होता है जहां भौतिक विपदाओं का नामोनिशान नहीं होता, न ही पग पग पर कोई संकट होता है ।

आज के दिन हम सब भी भगवान् से यही प्रार्थना करते हैं ,की वे हमे इस भव सागर से पार लगा दे।

उत्सव के मुख्य बिंदु -

ग्रीष्म ऋतु की तपती गर्मी में भगवान को राहत देने के लिए उन्हें सुगंधित जल में नौका विहार कराया जाता है।

भगवान भी एक व्यक्ति हैं ,इस बात को शास्त्रों के आधार पर समझते हुए उन्हें शीतलता प्रदान करने के लिए इस महीने उन्हें प्रतिदिन चंदन भी लगाया जाता है और नौका विहार का उत्सव भी मनाया जाता हैं ।ये भक्तों के भगवान से प्रेम के आदान प्रदान का प्रतीक है।

उत्सव के दौरान धूमधाम से हरे कृष्ण महामंत्र का कीर्तन किया जाता है जो कलयुग के जीवों के उद्धार के लिए तारक मंत्र है।

भक्त मंदिर के कुंड में नौका को सजाकर उसमें राधा कृष्ण के विग्रह को बैठाते हैं ,उन पर फूलों की वर्षा करते हैं और खूब उत्साह से भजन कीर्तन और नृत्य किया जाता हैं।

भगवान के लिए विभिन्न व्यंजन और पकवान बनाकर प्रेम से भोग लगाया जाता है, और भक्त मिलजुल कर बाद में उस महाप्रसाद का आस्वादन करते हैं।

इस तरह से सुंदर उत्सव हर मंदिर में मनाया जाता है।

आप भी इस उत्सव में भाग ले कर भगवान के प्रति अपने प्रेम को प्रकट कर सकते हैं ।

हम सब को आप का इंतजार रहेगा ,आइए सभी साथ मिलकर बड़े ही धूमधाम से इस उत्सव को मनाए।

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