International Society for Krishna Consciousness

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Purushottam Maas 17 May - 15 Jun 2026

पवित्र पुरुषोत्तम मास की अद्भुत महिमा

साल में १२ महीने होते हैं, और १२ महीने से बनता है एक साल! फिर यह “१३ वाँ महीना” कहाँ से आया है?

कहीं इसे अधिक मास कहा जाता है, कहीं मलमास, और कहीं पुरुषोत्तम मास।

आखिर इसके पीछे क्या रहस्य समाया है?

शास्त्र और आचार्यों की दृष्टि से देखें तो - भगवान ने पुरुषोत्तम मास के द्वारा सभी जीवों पर असीम कृपा और प्रेम बरसाया है।

इसी मास में हिरण्यकशिपु का वध कर , नन्हे भक्त प्रहलाद को भी भगवान नरसिंह ने बचाया है ।

वैदिक गणना के अनुसार सौर वर्ष लगभग ३६५ दिनों का होता है, जबकि चंद्र वर्ष लगभग ३५४ दिनों का। इस प्रकार दोनों में लगभग ११ दिनों का अंतर आ जाता है। यही अंतर लगभग ३२ महीनों में मिलकर एक अतिरिक्त महीने का निर्माण करता है, जिसे अधिक मास कहा जाता है।

इस मास में सूर्य की कोई संक्रांति नहीं होती, इसलिए विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन आदि मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। इसी कारण इसे “मलमास” भी कहा गया।

लेकिन भगवान की दृष्टि में यह मास अत्यंत पवित्र है।

कैसे बना ये “पुरुषोत्तम मास”?

कथा आती है कि जब सभी लोग इस मास की उपेक्षा और निंदा करने लगे, तब अधिक मास भगवान श्रीहरि के पास गया।

भगवान ने करुणा करके उसे अपना ही नाम प्रदान किया और कहा—

“अब यह मास मेरे नाम से जाना जाएगा — पुरुषोत्तम मास।”

भगवान श्रीकृष्ण भगवद्गीता (१५.१८) में कहते हैं—

अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥

अर्थात —

“मैं नश्वर संसार और अविनाशी जीवात्मा दोनों से श्रेष्ठ हूँ, इसलिए संसार और वेदों में ‘पुरुषोत्तम’ नाम से प्रसिद्ध हूँ।”

तभी से यह मास भगवान श्रीकृष्ण को अत्यंत प्रिय माना गया।

इस मास का वास्तविक महत्व:-

पुरुषोत्तम मास केवल एक अतिरिक्त महीना नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और भक्ति का विशेष अवसर है। इस अधिक मास में अधिक भक्ति कर ,भगवान को प्राप्त करने का सुनहरा अवसर सहज रूप से सबको सुलभ होता है ।

भक्ति की दृष्टि से मल मास का अर्थ है -यह मास हमारे हृदय के मल रूपी विकारों — काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार — को दूर करने की शक्ति रखता है।

शास्त्रों में कहा गया है कि इस मास में किए गए जप, तप, दान, व्रत, सत्संग और भक्ति का फल अनेक गुना बढ़ जाता है। इसलिए भक्तजन बड़े उत्साह से इस मास की प्रतीक्षा करते हैं।

वास्तव में पुरुष तो एक ही है - वे है भगवान श्री कृष्ण !

पर इस भौतिक जगत में शरीर के आधार पर हम किसी को पुरुष या किसी को स्त्री कहते हैं।

हम कई जन्मों से स्वयं को “भोक्ता” मानकर संसार का भोग करने का प्रयास करते आए हैं।

लेकिन पुरुषोत्तम मास हमें “भोक्ता” से “भगवान का सेवक” बनने की सुंदर दिशा देता है।

पुरुषोत्तम मास में क्या करें?

यह महीना विशेष रूप से भक्ति और साधना के लिए श्रेष्ठ माना गया है। इस दौरान भक्तगण —

*ब्रह्म मुहूर्त में उठते हैं।

*भगवान के नाम का जप करते हैं।

*मंगला आरती में भाग लेते हैं।

*भगवद्गीता एवं श्रीमद्भागवत का अध्ययन करते हैं।

*दीपदान करते हैं।

*सत्संग एवं कथा श्रवण करते हैं।

*एकादशी व्रत का पालन करते हैं।

*दान-पुण्य करते हैं।

*विशेष रूप से गीता का १५ वाँ अध्याय पढ़ना अत्यंत शुभ माना गया है।

इस मास में क्या नहीं किया जाता?

पुरुषोत्तम मास में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे नए मांगलिक कार्य सामान्यतः नहीं किए जाते, क्योंकि यह समय मुख्य रूप से भगवान की भक्ति और आत्मचिंतन के लिए समर्पित माना गया है।

*निष्कर्ष*

पुरुषोत्तम मास भगवान की विशेष कृपा प्राप्त करने का दुर्लभ अवसर है।

यदि हम इस पावन समय में श्रद्धा, भक्ति और नियमपूर्वक साधना करें, तो हमारा जीवन आध्यात्मिक रूप से उन्नत हो सकता है।

आइए, हम सब मिलकर इस पवित्र मास का अधिक से अधिक लाभ उठाएँ और भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति कर अपने जीवन को सफल बनाएँ।

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