दिव्यद्-वृन्दारण्य-कल्पद्रुमाधः
श्रीमद्-रत्नागार-सिंहासनस्थौ।
श्रीमद्-राधा-श्रील-गोविन्ददेवौ
प्रेष्ठालीभिः सेव्यमानौ स्मरामि॥
भावार्थपरम शोभामय श्रीवृन्दावन में कल्पवृक्ष के नीचे, परमसुन्दर रत्नों के द्वारा बने हुए भवन में, मणिमय सिंहासन पर विराजमान एवं अपनी अतिशय प्रिय श्रीललिता-विशाखा आदि सखियों के द्वारा प्रतिक्षण जिनकी सेवा होती रहती है, मैं उन श्रीमती राधिका एवं श्रीमान गोविन्ददेव जी का स्मरण करता हूँ।