1आमार निताई मिले ना भोलामन
गौर मिले ना
सारा गाये माखिले तिलक
गौर मिले ना॥
भावार्थहे चंचल मन! अपना सम्पूर्ण शरीर पवित्र तिलक से सुशोभित करने पर भी श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीगौरांग महाप्रभु का दर्शन नही हो रहा है।
2भितर बहिर् ठिकना ह’ले
गौर प्रेम कि कथाए मिले
(ओ तोर) ठिक ना ह’ले उपासना
तिल देइ ना तोर से सोना
सार गाये...॥
भावार्थआंतरिक एवं बाहरी रूप से शुद्ध हुए बिना गौरांग महाप्रभु का प्रेम प्राप्त का होना कठिन है। पूजा के समय यदि मन शुद्ध नहीं होगा तो वह उनके दर्शन प्राप्ति का सुवर्ण अवसर खो देगा।
3मन परिस्कर कर आगे
गौर भजन अनुरागे
अनुरागे तिलक केते
गौर भजन ह’ल ना (हाय भोलामन)॥
भावार्थश्रीचैतन्य महाप्रभु की पूजा करने से पहले मन को शुद्ध होना होगा। लेकिन हे चंचल मन, यदि तुम्हारी भक्ति केवल शरीर को तिलक से सुशोभित करने तक ही सीमित होगी तो तुम श्रीचैतन्य महाप्रभु की उपासना वास्तविक रूप से नहीं कर रहे हो।
4जे जोन मुक्तगोष्टी आदर करे
आमार दयाल निताई ताहाँर घरे
(ओ तोर) तरे भक्ति भारे दकले परे
उत्तर सदा सफल ह’बे॥
भावार्थजो व्यक्ति वास्तव में शाश्वत भक्तिमय सेवा की स्तुति करता है, उसी के घर में हमारे दयालु श्रीनित्यानंद प्रभु निवास करते हैं। उनकी कृपा के लिए जोर से आर्तनाद करने से ही मनुष्य की भक्तिभावना बढ़ती है और भक्तिमय साधना भी सफल हो जाती है।