International Society for Krishna Consciousness

Founder Acharya — HDG A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada

Hare Krishna Hare Krishna, Krishna Krishna Hare Hare
Hare Rama Hare Rama, Rama Rama Hare Hare

Vaishnav Bhajan

अवतार सार

Composed by लोचनदास ठाकुर

1
अवतार सार, गोरा अवतार, केन ना भजिलि ताँरे। करि’नीरे वास, गेल ना पियास, आपन करम फेरे॥
भावार्थअरे मन! तुने समस्त अवतारों के शिरोमणि श्रीगौरसुन्दर का भजन क्यों नहीं किया? जल में निवास करते हुए भी तेरी प्यास दूर नहीं हुई, तो इसमें तेरे ही कर्मोंका दोष है क्योंकि ...
2
कन्टकेर तरु, सदाइ सेविलि (मन), अमृत पाइवार आशे। प्रेम कल्पतरु, श्रीगौराङ्ग आमार, ताहारे भाविलि विषे॥
भावार्थतू तो सर्वदा अमृत सदृश सुमिष्ट फल की प्राप्ति की आशा से काँटेदार वृक्ष की सेवा करता रहा। परन्तु प्रेम के कल्पवृक्षस्वरूप हमारे श्रीगौरसुन्दर को विष सदृश जानकर उनका परित्याग कर दिया।
3
सौरभेर आशे, पलाश शुँकिलि (मन), नाशाते पशिल कीट। ‘इक्षुदण्ड’ भावि, काठ चुषिलि (मन), केमने पाइबि मिठ॥
भावार्थअरे मन! सुगन्ध प्राप्ति की आशा से तूने कीड़ों से भरे हुए पलास पुष्प को सूँघा जिसके फलस्वरूप वे सब कीड़े तेरी ना में घुस गए तथा ईख जानकर एक सूखी सी लकड़ी को चूसा।
4
‘हार’ बलिया, गलाय परिलि (मन), शमन किंकर साप। ‘शीतल’ बलिया, आगुन पोहालि (मन), पाइलि वजर ताप॥
भावार्थतू स्वयं विचार कर कि तूझे सुमिष्ट रस कैसे मिलेगा? यमदूत रूपी सर्पों को (मृत्यु को) सुन्दर हार समझकर अपने गले में लपेट लिया, दहकती हुई आग को शीतल जानकर तू उसमं प्रवेश कर गया और असह्ययकष्ट से बिल-बिलाने लगा।
5
संसार भजिलि, श्रीगौराङ्ग भुलिलि, ना शुनिलि साधुर कथा। इह परकाल, दुकाल खोयालि (मन), खाइलि आपन माथा॥
भावार्थअरे मन! तूने जीवन में कभी साधु की बात तो मानी नहीं तथा श्रीगौरसुन्दर को भूलकर संसार का भजन किया। इस प्रकार तूने अपना यह लोक और परलोग दोनों का ही नष्ट कर दिया।