1भाले गोरागदाधरेरारति नेहारि
नदीयापूरबभावे जाउ बोलिहारि॥
भावार्थबडे़ सौभाग्य से श्रीगौर-गदाधर की आरती के दशर्न कर रहा हूँ, मैं नदिया के पूर्व भाव (श्री श्री राधा-कृष्ण वृन्दावन लीला में) को बलिहारी जाता हूँ।
2कल्पतरुतले रत्नसिंहासनोपरि
सबु सखीबेष्टित किशोरकिशोरी॥
भावार्थकल्पवृक्ष के नीचे, रत्न सिंहासन के ऊपर किशोर-किशोरी समस्त सखियों सहित विराजमान हैं।
3पुरटजडित कोत मणिगजमति
झमकिऽझमकिऽलभे प्रतिअङ्गज्योतिः॥
भावार्थजिनके अंगों में स्वर्ण, मणि, गजमुक्ता आदि से युक्त आभूषण समूह सुशोभित हो रहे हैं तथा जिनकी अंगकान्ति अतिशय दिव्य ज्योति सम्पन्ना है।
4नील नीरद लागिऽविद्युत्माला
दुंहु अङ्ग मिलिऽशोभा भुवनउजाला॥
भावार्थनीले बादलों में विद्युत की माला के समान दोनों के अंग मिलकर अपूर्व सुन्दर शोभा का विस्तार करके जगत को देदीप्यमान कर रहे हैं।
5शङ्ख बाजे, घन्टा बाजे, बाजे करताल॥
भावार्थशंख, घंटा, करताल और मधुर-मधुर मृदंग आदि वाद्य बज रहे हैं।
6मधुर मृदङ्ग बाजे परम रसाल
विशाखादि सखीवृन्द दुंहु गुन गाओ?ए
प्रियनर्मसखीगण चामर धुलाओ?ए॥
भावार्थविशाखा आदि सखियाँ दोनों के गुण गा रही हैं और प्रिय नर्म सखियाँ चामर ढुला रही हैं।
7अनङ्ग मञ्जरी चुयाचन्दन देओ?ए
मालतीर माला रूप मञ्जरी लागाओ?ए॥
भावार्थअनंग मंजरी उनके श्रीअंगो में चुआ चन्दन दे रही हैं। श्रीरूप मंजरी मालती की माला पहना रही हैं।
8पञ्चप्रदीपे धोरिऽकर्पूरबाति
ललितासुन्दरी कोरे जुगलआरति॥
भावार्थजब पंचप्रदीप में कर्पूर की बत्ती लगाकर श्रीललिता सखी युगल आरती करने लगी...
9देवीलक्ष्मीश्रुतिगण धरणी लोटाओ?ए
गोपीजनअधिकार रओ?अत गाओ?ए॥
भावार्थतब देवियाँ, लक्ष्मियाँ, श्रुतियाँ धरती पर लोट-पोट खाने लगीं, गोपियों के जैसे अधिकार को रो-रोकर माँगने लगी।
10भकतिविनोद रोहिऽसुरभीकि कुञ्जे
आरतिदरशने प्रेमसुख भुञ्जे॥
भावार्थश्रीभक्तिविनोद ठाकुर सुरभी कुंज में रहकर इस आरती का दर्शन करके प्रेम-सुख का अनुभव करते हैं।