International Society for Krishna Consciousness

Founder Acharya — HDG A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada

Hare Krishna Hare Krishna, Krishna Krishna Hare Hare
Hare Rama Hare Rama, Rama Rama Hare Hare

Vaishnav Bhajan

बोडो़ सुखेर खबर

Composed by भक्तिविनोद ठाकुर

1
बड़ सुखेर खबर गाइ। सुरभी-कुञ्जेते नामेर हाट खुलेछे, खोद निताई॥
भावार्थमैं महान्‌ प्रसन्नता की खबर का गान कर रहा हूँ। श्री नवद्वीप में सुरभि-कुँज नामक स्थान पर, अब पवित्र भगवन्नाम का बाजार खुल गया है और भगवान्‌ नित्यानन्द स्वयं उसके स्वामी व मालिक है।
2
बड़ मोजार कोथा ताय। श्रद्धामूल्ये शुद्ध नाम सेइ हाटेते बिकाय॥
भावार्थउस आनन्दमय बाजार में ऐसी आश्चर्यजनक बातें हो रही हैं! श्री नित्यानंद प्रभु, केवल वयक्ति की श्रद्धा एवं विश्वास की कीमत चुकाने के लिए, शुद्ध एवं पवित्र भगवन्नाम को थोंक में (अर्थात्‌ कम दामों में) बेंच रहे हैं।
3
यत भक्तवृन्द वसि। अधिकारी देखे’ नाम बेच्छे दर कषि॥
भावार्थभगवन्नाम को खरीदने के लिए उत्सुकता पूर्वक प्रतीक्षा करते हुए भक्तों की सभा देखकर, भगवान्‌ नित्यानंद उनकी योग्यता का परीक्षण करने के लिए, सर्वप्रथम उनमें से प्रत्येक की परीक्षा लेते हैं, उनकी जाँच करते हैं तब वे अपनी कीमत के अनुसार सौदेबाजी करके उन्हें भगवन्नाम बेचते हैं।
4
यदि नाम किनबे, भाइ। आमार संगे चल, महाजनेर काछे याइ॥
भावार्थहे मेरे प्रिय मित्रों! तुम यदि वास्तव में इस शुद्ध एवं पवित्र नाम को खरीदना चाहते हो, तब मेरे साथ आओ, क्योंकि अब मैं इन नित्यानंद महाजन से मिलने के लिए जा रहा हूँ।
5
तुमि किनबे कृष्णनाम। दस्तुरी लइब आमि, पूर्ण हबे काम॥
भावार्थअतः तुम अंत में शुद्ध एवं पवित्र भगवन्नाम को अर्जित कर पाओगे या प्राप्त कर पाओगे। मैं भी अपना प्राप्य आयोग (कमीशन) ले लूँगा, और इस प्रकार, हम तीनों ही अपनी इच्छाएँ पूर्ण कर लेगें।
6
बड़ दयाल नित्यानन्द। श्रद्धामात्र लये देन परम-आनन्द॥
भावार्थश्रीनित्यानंद प्रभु असाधारण रूप से इतने अधिक उदार व दयालु हैं- पवित्र भगवन्नाम में, वयक्ति की केवल श्रद्धा एवं विश्वास को ही स्वीकार करके, वे श्रेष्ठतम दिवय आनन्द प्रदान कर देते हैं।
7
एक बार देखले चक्षे जल। ‘गौर’ बले’ निताई देन सकल सम्बल॥
भावार्थजब निताई, ‘गौर!’ के नाम का उच्चारण करने पर किसी वयक्ति के नेत्र में अश्रु बहते हुए देखते हैं, वे तुरंत उस वयक्ति को अपना आश्रय दे देते हैं वस्तुत वे उसे समस्त दिवय ऐश्वर्य प्रदान कर देते हैं।
8
देन शुद्ध कृष्ण शिक्षा। जाति, धन, विद्या, बल ना करे अपेक्षा॥
भावार्थवे उस वयक्ति को श्रीकृष्ण की शुद्ध शिक्षाओं की यथार्थ (असली) अनुभूति (साक्षात्कार) प्रदान करते हैं जैसी भगवद्‌गीता एवं श्रीमद्‌ भागवतम्‌ में मिलती है। इस सारी अचिन्तय (अकल्पनीय) कृपा का प्रदर्शन करते हुए, वे वयक्ति की जाति, भौतिक संपत्ति, साधारण भौतिक ज्ञान, या शारीरिक योग्यता की ओर कोई ध्यान नहीं देते।
9
अमनि छाडे माया जाल। गृहे थाक, वने थाक ना थाके जञ्जाल॥
भावार्थअब, प्रिय मित्रों, कृपया माया के जाल में फसाने वाले समस्त फंदो को अस्वीकार कर दो। यदि आप एक गृहस्थ हैं, तब केवल अपने घर में ही रहिए; यदि आप सन्यास ग्रहण कर चुके हैं, तब केवल वन में रहिए। किसी भी स्थिति में, आपको और अधिक कष्ट नहीं मिलेगा।
10
आर नाहिको कलिर भय। आचण्डाले देन नाम निताई दयामय॥
भावार्थहमें अब और अधिक, झगड़े व कलह के भयानक युग से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि अत्यन्त उदार एवं दयालू भगवान्‌ नित्यानंद किसी को भी और प्रत्येक को पवित्र भगवन्नाम प्रदान करते हैं यहाँ तक कि लोगों में सबसे निम्न वयक्ति को भी।
11
भक्तिविनोद डाकि’ कय। निताई चरण बिना आर नाहि आश्रय॥
भावार्थभक्तिविनोद जी जोर से पुकारते हैं और सभी को घोषणा करते हैं, “भगवान्‌ नित्यानंद के चरण कमलों के अतिरिक्त, कोई आश्रय नहीं है। ”