International Society for Krishna Consciousness

Founder Acharya — HDG A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada

Hare Krishna Hare Krishna, Krishna Krishna Hare Hare
Hare Rama Hare Rama, Rama Rama Hare Hare

Vaishnav Bhajan

दुर्लभ मानव जनम

Composed by भक्तिविनोद ठाकुर

1
दुर्लभ मानव-जनम लभिया संसारे। कृष्ण ना भजिनु,-दुःख कहिब काहारे?॥
भावार्थदुर्लभ मानव जीवन प्राप्त करने के बाद भी मैंने भगवान्‌ श्रीकृष्ण की आराधना नहीं की। मैं इस दुःखद कथा को किससे कहूँ?
2
‘संसार’ ‘संसार’, करे मिछे गेल काल। लाभ ना हइल किछु, घटिल जंजाल॥
भावार्थमैंने अपना समय सांसारिक कार्यकलापों में वयर्थ ही गँवा दिया तथा किन्चित्‌ भी लाभ प्राप्त नहीं किया। वास्तव में, मैं भौतिक जंजाल में अधिकाधिक फँसता चला गया।
3
किसेर संसार एइ छायाबाजी पाय। इहाते ममता करि’वृथा दिन जाय॥
भावार्थयह भौतिक जगत्‌ ऐन्द्रजालिक है। इस भ्रम से आसक्त होने के कारण, मैं वयर्थ ही अपना समय गवाँ रहा हूँ।
4
ए-देह पतन ह’ले कि रबे आमार? केह सुख नाहि दिबे पुत्र-परिवार॥
भावार्थजब मेरा यह शरीर समाप्त हो जाएगा, तब मेरा स्वयं का शेष ही क्या रह जाएगा? मेरे पुत्र तथा पत्नी समेत कोई मुझे सुख देने में सक्षम नहीं रहेगा।
5
गर्दभेर मत आमि करि परिश्रम। का’र लागि’एत करि, ना घुचिल भ्रम॥
भावार्थमैं गधे के समान परिश्रम कर रहा हूँ, हालाँकि मुझे ज्ञात नहीं है कि मैं किसलिए इतना परिश्रम कर रहा हूँ। लेकिन, फिर भी मेरा भ्रम दूर नहीं हुआ।
6
दिन याय मिछा काजे, निशा निद्रा-वशे। नाहि भावी-मरण निकटे आछे ब’से॥
भावार्थमेरे दिन वयर्थ के कार्यकलापों में वयतीत होते हैं तथा मेरी रात्रि निद्रा में वयतीत होती है। तब भी मुझे इस बात का आभास नहीं है कि मृत्यु ठीक मेरे साथ ही बैठी है।
7
भाल मन्द खाइ, हेरि, परि, चिन्ता-हीन। नाहि भावि, ए-देह छाड़िब कोन दिन॥
भावार्थमैं स्वादिष्ट भोजन ग्रहण करता हूँ, मनोहर वस्तुओं को देखता हूँ तथा मैं आकर्षक कपड़े पहनता हूँ। इस प्रकार, मैं निश्चिंत रहता हूँ। मैं कदापि विचार नहीं करता कि किसी भी समय मुझे यह शरीर छोड़ना पड़ सकता है।
8
देह-गेह-कलत्रादि - चिन्ता अविरत। जागिछे हृदये मोर बुद्धि करि’हत॥
भावार्थपत्नी, बच्चे, घर आदि के विचार निरंतर मेरे हृदय में आ रहे हैं तथा मेरी बुद्धि का दमन कर रहे हैं।
9
हाय, हाय! नाहि भावी, अनित्य ए-सब। जीवन विगते कोथा रहिबे वैभव?॥
भावार्थहाय! हाय! मैं इन वस्तुओं को अनित्य नहीं समझ रहा। जब यह शरीर समाप्त हो जायेगा, तो मेरा वैभव कहाँ रह जायेगा?
10
स्मशाने शरीर मम पड़िया रहिबे। विहंग-पतंग ताय विहार करिबे॥
भावार्थमेरा शरीर श्मशान में पड़ा होगा तथा पक्षी एवं कीड़े-मकोड़े उसका भक्षण कर आनन्द प्राप्त कर सकेंगे।
11
कुक्कुर शृगाल सब आनन्दित हये। महोत्सव करिबे आमार देह लये॥
भावार्थकुत्ते तथा सियार आनन्दपूर्वक मेरे शरीर का भक्षण कर महोत्सव मनाएँगे।
12
ये देहरे एइ गति, तार अनुगत। संसार-वैभव आर बन्धु-जन यत॥
भावार्थभौतिक शरीर की यही गति है। सांसारिक वैभव तथा मित्र इस शरीर से ही सम्बन्धित है।
13
अतएव माया-मोह छाड़ि’ बुद्धिमान। नित्यतत्त्व कृष्णभक्ति करुन सन्धान॥
भावार्थयह सब समझने के पश्चात्‌, बुद्धिमान वयक्तियों को चाहिए कि वे इस शरीर से अपनी भ्रामक आसक्ति को त्याग दें तथा भगवान्‌ कृष्ण की भक्ति में रत होकर शाश्वत सत्य की खोज करें।