1गौरांगेर दु’टि पद, याँर धन सम्पद,
से जाने भकति रस-सार।
गौरांगेर मधुर लीला,याँ’र कर्णे प्रवेशिला,
हृदय निर्मल भेल ता’र॥
भावार्थश्रीगौरांगदेव के श्रीचरणयुगल ही जिसका धन एवं संपत्ति हैं, वही व्यक्ति भक्तिरस के सार को जान सकते हैं। जिनके कानों में गौरांगदेव की मधुर लीलायें प्रवेश करती हैं, उनका हृदय निर्मल हो जाता है।
2जे गौरांगेर नाम लय, तार हय प्रेमोदय,
तारे मुइ जाइ बलिहारि।
गौरांग-गुणेते झुरे, नित्यलीला ता’रे स्फुरे,
से-जन भकति अधिकारी॥
भावार्थजो गौरांगदेव का नाम लेता है, उनके हृदय में भगवत्प्रेम उदित हो जाता है। मैं ऐसे भक्त पर बलिहारी हो जाता हूँ जो गौरांग के गुणों में रमण करता हो, उसके अंदर ही श्रीश्री राधा-कृष्ण की नित्य-लीलाएँ स्फुरित होती रहती हैं, वही भक्ति के अधिकारी हैं।
3गौरांगेर संगिगणे, नित्यसिद्ध करि’ माने,
से जाय ब्रजेन्द्रसुत पाश।
श्रीगौड़मण्डल-भूमि, येबा जाने चिन्तामणि,
ता’र हय ब्रजभूमे वास॥
भावार्थश्रीगौरचन्द्र के संगियों को नित्यसिद्ध माननेवाला व्यक्ति व्रजेन्द्र-सुत श्रीकृष्ण के पास उनके परमधाम को जाता है तथा श्रीगौड़मण्डल की भूमि को जो चिंतामणि के सदृश (अप्राकृत) मानता है, वह व्रजभूमि में वास करता है।
4गौरप्रेम रसार्णवे, से तरंगे जेबा डुबे,
से राधामाधव-अन्तरङ्ग।
गृहे वा वनेते थाके, ‘हा गौराङ्ग!’ ब’ले डाके,
नरोत्तम मागे ता’र सङ्ग॥
भावार्थजो गौरसुन्दर के प्रेमरस की तरंगों में डूब जाता है, वह श्रीराधामाधव का अंतरंग पार्षद बन जाता है। वह गृह में रहे या वन मे, यदि वह गौरसुन्दर के प्रेमरस सागर में डूबकर “हा गौराङ्ग! हा गौराङ्ग!” कहकर पुकारता है, तो नरोत्तमदास ठाकुर उसके संग की कामना करते हैं।