1गोपीनाथ, घुचाओ संसार ज्वाला।
अविद्या-यातना, आर नाहि सहे,
जनम-मरण -माला॥
भावार्थहे गोपीनाथ! कृपया इस भौतिक संसार रूपी अग्नि का शमन कर दीजिए। मुझसे अविद्या तथा पुनः पुनः जन्म-मरण का चक्र नहीं सहा जाता।
2गोपीनाथ, आमि त’कामेर दास।
विषय वासना, जागिछे हृदये,
फाँदिछे करम फाँस॥
भावार्थहे गोपीनाथ! मैं काम वासना का दास हूँ। विषय वासनायें सदैव मेरे हृदय में उदित होती रहती हैं तथा ये मुझे कर्म के जंजाल में फँसाती रहती हैं।
3गोपीनाथ! कबे वा जागिब आमि।
कामरूप अरि, दूरे तेयागिब,
हृदय स्फुरिबे तुमि॥
भावार्थहे गोपीनाथ! मैं कब जागूँगा तथा अपने हृदय से काम रूपी शत्रु को दूर करने में समर्थ बन पाऊँगा। केवल, तभी आप मेरे हृदय में प्रकट होंगे।
4गोपीनाथ, आमि त तोमार जन।
तोमारे छाड़िया, संसार भजिनु,
भुलिया आपन-धन॥
भावार्थहे गोपीनाथ! मैं आपका ही हूँ। मैंने आपके चरण कमलों को त्याग कर इस भौतिक जगत् की सेवा की। इस प्रकार करने से, मैंने अपनी ही सम्पति का तिरस्कार किया है।
5गोपीनाथ, तुमि त’सकलि जान।
आपनार जने, दन्डिया एखन,
श्रीचरणे देह स्थान॥
भावार्थहे गोपीनाथ! आप सर्वज्ञ हैं। अब, कृपया मुझे दंडित कीजिए क्योंकि मैं तो आपका दास हूँ तथा मुझे अपने चरणकमलों की छाया प्रदान कीजिए।
6गोपीनाथ, एइ कि विचार तव।
विमुख देखिया, छाड़ निज-जने,
ना कर’ करुणा-लव॥
भावार्थहे गोपीनाथ! यह कैसा न्याय है? क्योंकि आपने मुझे विमुख पाया, तो आपने मुझे अपनी करुणा की बिन्दु दिए बिना ही त्याग दिया।
7गोपीनाथ, आमि त मूरख अति
किसे भाल हय, कभु ना बुझिनु,
ताह हेन मम गति॥
भावार्थहे गोपीनाथ! मैं अति मूर्ख हूँ। मुझे ज्ञात नहीं है कि मेरा कल्याण किसमें है। मुझे जीवन के लक्ष्य के विषय में किन्चित् भी समझ में नहीं आया। अतएव, मेरी स्थिति शोचनीय है।
8गोपीनाथ, तुमि त पंडितवर।
मूढ़ेर मंगल, तुमि अन्वेषिबे
ए दासे ना भाव’पर॥
भावार्थहे गोपीनाथ! आप सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी हैं। मुझे दृढ़ विश्वास है कि आप मेरे हित के विषय में अवश्य ही अन्वेषण करेंगे। कृपया मुझे अपरिचित न समझें।