1गोरा पहूँ ना भजिया मैनु।
प्रेम-रतन-धन हेलाय हाराइनु॥
भावार्थहे गौरांग महाप्रभु! मैंने आपके श्रीचरणों का भजन नहीं किया। अपनी लापरवाही से मैंने दिव्य
प्रेम धन (रत्न-धन) को खो दिया।
2अधने यतन करि’ धन तेयागिनु।
आपन करम-दोषे आपनि डुबिनु॥
भावार्थउस प्रेमधन को त्यागकर मैं सांसारिक नाशवान् विषयों के संग्रह में लगा रहा। इस प्रकार अपने ही कर्मों के दोष से मैंने स्वयं को संसाररूपी सागर में डुबो दिया।
3सत्संग छाड़ि’ कैनु असते विलास।
ते-कारणे लागिल ये कर्मबन्ध-फाँस॥
भावार्थमैं सत्संग का परित्यागकर, असत् विषयों में रमता रहा इसलिए मैं कर्मों के बन्धन में फँस गया।
4विषय विषम विष सतन खाइनु।
गौर कीर्तन रसे मगन ना हइनु॥
भावार्थइंद्रियतृप्ति रूपी विषम-विष का पान मैं निरन्तर करता रहा, परन्तु श्रीगौरसुन्दर के कीर्तन रस में मग्न नहीं हो सका।
5केन वा आछये प्राण कि सुख पाइया।
नरोत्तमदास केन ना गेल मरिया॥
भावार्थश्रील नरोत्तमदास ठाकुर कहते हैं- श्रीगौरांगदेव के भजन बिना मेरे शरीर में किस सुख के लिए अब तक प्राण बचे हैं? मैं अभी तक मर क्यों नहीं गया?