1गुरुदेव!
कृपाबिन्दु दिया, कर’ एइ दासे,
तृणापेक्षा अति हीन।
सकल-सहने, बल दिया कर,
निज-माने स्पृहा-हीन॥
भावार्थहे गुरुदेव! कृपया आप इस दास पर अनुकम्पा करें तथा इस प्रकार इसें अपने आपको सड़क पर पड़े हुए तिनके से भी अधिक हीन समझने की योग्यता प्रदान करें। कृपया मुझे सबकुछ सहने की शक्ति प्रदान करें तथा मुझे भौतिक इच्छाओं से मुक्त बनाएँ।
2सकले-सम्मान, करिते शकति,
देह, नाथ! यथायथ।
तबे त’ गाइब, हरिनाम सुखे,
अपराध ह’बे हत॥
भावार्थकृपया मुझे शक्ति प्रदान करें कि मैं सबको सम्मान दे सकूँ। इस प्रकार मैं आनन्दपूर्वक भगवान् हरि के पवित्र नाम का जप कर सकूँगा तथा मेरे अपराध शून्य हो जाएँगे।
3कबे हेन कृपा, लभिया ए-जन,
कृतार्थ हइबे, नाथ!
शक्ति-बुद्धि हीन, आमि अति दीन,
कर’ मोरे आत्मसाथ॥
भावार्थकब मेरा जीवन आपकी कृपा प्राप्त करके सफल हो पाएगा? मैं शक्ति एवं बुद्धि से हीन हूँ। मैं एक पतितात्मा हूँ, अतएव कृपया मुझे अपना दास स्वीकार करें।
4योग्यता-विचारे, किछु नाहि पाइ,
तोमार करुणा-सार।
करुणा न हइले, काँदिया काँदिया,
प्राण ना राखिब आर॥
भावार्थयदि आप मुझमें कोई भी योग्यता ढूँढ़ने का प्रयास करेंगे तो आपको कुछ भी योग्यता नहीं मिलेगी। आपकी कृपा ही मेरी एकमात्र संपत्ति है। यदि आपने मुझ पर करुणा नहीं की तो मैं रोते-रोते अपने जीवन का अंत कर दूँगा।