1हरि हरि! कबे मोर हइबे सुदिन
भजिब श्री – राधा – कृष्ण हइया प्रेमाधीन॥
भावार्थहे हरि! मेरा ऐसा दिन कब आएगा, जब मैं कृष्ण प्रेम के वशीभूत होकर राधाकृष्ण श्रीयुगलका भजन करूँगा।
2सुयंत्रे मिशाइया गाब सुमधुर तान
आनंदे करिब दोंहार रूप – गुण – गान॥
भावार्थमृदंग, करताल आदि वाद्ययन्त्रोंकी सहायता से सुमधुर ताल स्वर मिलाते हुए दोनों के रूप एवं गुणोंका गान करूँगा।
3‘राधिका – गोविन्द’ बलि कांदिब उच्छैःस्वरे
भिजिबे सकल अंग नयनेर नीरे॥
भावार्थ‘हे राधे! हे गोविन्द!’ कहते हुए जोर-जोर से रोऊँगा तथा आसुओंसे मेरा सारा शरीर भीग जाएगा।
4एइ बार करुणा कर रूप सनातन
रघुनाथ दास मोर श्रीजीव – जीवन॥
भावार्थहे रूप गोस्वामी! हे सनातन गोस्वामी! हे रघुनाथदास गोस्वामी! हे जीव गोस्वामी! आप एकबार मुझपर करुणा कीजिए।
5एइ बार करुणा करो ललिता – विशाखा
सख्य भावे श्रीदाम – सुबल – अदि सखा॥
भावार्थहे ललिताजी! हे विशाखाजी! सख्यभावयुक्त श्रीदाम, सुबल आदि सखा, आप एकबार मुझपर करुणा कीजिए।
6सबे मिलि कर दया पुरूक मोर आश
प्रार्थना करये सदा नरोत्तम दास॥
भावार्थआप सब लोग मिलकर मुझपर दया कीजिए जिससे कि मेरी आशा पूर्ण हो जाए। नरोत्तम दास की सदा यही प्रार्थना है।