1जय जय श्रीकृष्णचैतन्य नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥
भावार्थश्रीचैतन्यमहाप्रभु की जय हो, श्री नित्यानन्दप्रभु की जय हो। श्री अद्वैतआचार्य की जय हो और श्रीगौरचंद्र के समस्त भक्तों की जय हो।
2कृपा करि’ सबे मेलि’ करह करुणा।
अधम पतितजने ना करिह घृणा॥
भावार्थकृपा करके सब मिलकर मुझपर करुणा कीजिए। मुझ जैसे अधम-पतित जीव से घृणा मत कीजिए।
3ए तिन संसार-माझे तुया पद सार।
भाविया देखिनु मने-गति नाहि आर॥
भावार्थमैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि तीनों लोकों में आपके चरणकमलों के अतिरिक्त और कोई आश्रय स्थान नहीं है।
4से पद पाबार आशे खेद उठे मने।
वयाकुल हृदय सदा करिय क्रन्दने॥
भावार्थउन श्रीचरणों की प्राप्ति के लिए मेरा मन अति दुःखी होता है और वयाकुल होकर मेरा हृदय भर जाता है। अतः मैं सदैव रोता रहता हूँ।
5कि रूपे पाइब किछु ना पाइ सन्धान।
प्रभु लोकनाथ-पद नाहिक स्मरण॥
भावार्थउन श्रीचरणों को कैसे प्राप्त करूँ इसका भी ज्ञान मुझे नहीं है और न ही मेरे गुरुदेव श्रील लोकनाथ गोस्वामी के चरणकमलों का मैं स्मरण कर पाता हूँ।
6तुमि त’ दयाल प्रभु! चाह एकबार।
नरोत्तम-हृदयेर घुचाओ अन्धकार॥
भावार्थहे प्रभु! आप सर्वाधिक दयालु हैं। अतः अपनी कृपादृष्टि से एकबार मेरी ओर देखिये एवं इस नरोत्तम के हृदय का अज्ञान-अंधकार दूर कीजिए।