1जीव जागो, जीव जागो, गोराचाँद बोले।
कत निद्रा जाओ माया-पिशाचीर कोले॥
भावार्थश्रीगौर सुन्दर कह रहे हैं- अरे जीव! जाग! सुप्त आत्माओ! जाग जाओ! कितनी देर तक मायारुपी पिशाची की गोद में सोओगे?
2भजिब बलिया ऐसे संसार-भितरे।
भुलिया रहिले तुमि अविद्यार भरे॥
भावार्थतू इस जगत में यह कहते हुए आया था, ‘हे मेरे भगवान्, मैं आपकी आराधना व भजन अवश्य करूँगा,’ लेकिन जगत में आकर अविद्या (माया)में फँसकर तू वह प्रतिज्ञा भूल गया है।
3तोमार लइते आमि हइनु अवतार।
आमि विना बन्धु आर के आछे तोमार॥
भावार्थअतः तुझे लेने के लिए मैं स्वयं ही इस जगत में अवतरित हुआ हूँ। अब तू स्वयं विचार कर कि मेरे अतिरिक्त तेरा बन्धु (सच्चा मित्र) अन्य कौन है?
4एनेछि औषधि माया नाशिबार लागि।
हरिनाम-महामंत्र लओ तुमि मागि॥
भावार्थमैं माया रूपी रोग का विनाश करने वाली औषधि “हरिनाम महामंत्र” लेकर आया हूँ। अतः तू कृपया मुझसे महामंत्र मांग ले।
5भकतिविनोद प्रभु-चरणे पडिया।
सेइ हरिनाममंत्र लइल मागिया॥
भावार्थश्रील भक्तिविनोद ठाकुर जी ने भी श्रीमन्महाप्रभु के चरण कमलों में गिरकर यह हरे कृष्ण महामंत्र बहुत विनम्रता पूर्वक मांग लिया है।