International Society for Krishna Consciousness

Founder Acharya — HDG A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada

Hare Krishna Hare Krishna, Krishna Krishna Hare Hare
Hare Rama Hare Rama, Rama Rama Hare Hare

Vaishnav Bhajan

कबे हबे हेन दशा मोर

Composed by भक्तिविनोद ठाकुर

1
कबे ह’बे हेन दशा मोर त्यजि’ जड आशा, विविध बन्धन, छाडिब संसार घोर॥
भावार्थअहो! मेरी ऐसी दशा कब होगी, जब मैं सांसारिक समस्त प्रकार की आशाओं (इच्छाओं) को एवं समस्त प्रकार के सांसारिक बंधनों को त्यागकर इस घोर अर्थात् दुःखपूर्ण संसार को ही त्याग दूँगा
2
वृंदावनभेदे, नवद्विप – धामे, बाँधिबो कुटीर – खानि शचिर नन्दन चरण – आश्रय करिब सम्बन्ध मानि’॥
भावार्थतथा मैं, श्रीवृन्दावन से अभिन्न, श्रीनवद्वीप धाम में एक कुटी बनाकर सम्बन्ध ज्ञान के साथ श्रीशचीनन्दन के श्रीचरण कमलों का आश्रय ग्रहण करूँगा।
3
जह्नवि – पुलिने, चिन्मय – कानने, बसिय विजन – स्थले कृष्णनामामृत, निरन्तर पिब, डाकिब ‘गौराङ्ग’ ब’ले॥
भावार्थजाह्नवी (गंगाजी) के चिन्मय कानन में किसी निर्जन स्थान में बैठकर सदैव श्रीकृष्ण नाम रूपी अमृत का पान करते हुए ‘हा गौराङ्ग! हा गौराङ्ग!’ पुकारता रहूँगा।
4
हा गौर निताई, तोरा दुटी भाइ, पतित जनेर बन्धु अधम पतित, आमि हे दुर्जन, हओ मोरे कृपासिन्धु॥
भावार्थहे गौरसुन्दर! हे नित्यानन्दप्रभु! आप दोनों भाई पतित जनों के परम बंधु हैं, तथा मैं अत्यन्त ही अधम तथा पतित हूँ। अतः मुझ जैसे दुर्जन के प्रति भी आप कृपा दृष्टि कीजिए।
5
काँदिते काँदिते, षोलक्रोश – धाम, जाह्नवि उभोयकुले भ्रमिते – भ्रमिते, कभु भाग्यफले, देखि किछु तरुमूले॥
भावार्थसोलह कोस परिमित श्रीनवद्वीप धाम में जाह्नवी के दोनों ही किनारों पर रोते-रोते भ्रमण करते हुए कभी सौभाग्य वशतः किसी वृक्ष के नीचे कुछ देखकर (आश्चर्य में) ...
6
‘हा हा’ मनोहर, कि देखिनु आमि, बलिया मूर्छित ह’ब संवित पाइया, काँदिब गोपने, स्मरि’ दुँहु कृपालव॥
भावार्थअहो! यह मैंने क्या देखा, ऐसा कहकर मूर्छित हो जाऊँगा तथा कुछ देर बाद होश में आने पर एकान्त में दोनों की कृपा का स्मरण कर रोता रहूँगा।