1कृष्ण तब पुण्य हबे भाइ।
ए पुण्य करिबे जबे राधारानी खुशी हबे॥
ध्रुव अति बोलि तोमा ताइ।
भावार्थहे भाइयों, मैं तुमसे निश्चित रूप से कहता हूँ कि तुम्हें भगवान् श्रीकृष्ण से पुण्यलाभ की प्राप्ति तभी होगी जब श्रीमती राधारानी तुमसे प्रसन्न हो जायेंगी।
2श्री सिद्धांत सरस्वती शची-सुत प्रिय अति
कृष्ण-सेवाय जाँर तुल नाए।
सेई से महंत-गुरू जगतेर मध्ये उरू
कृष्ण भक्ति देय ठाइ-ठाइ॥
भावार्थशचिपुत्र (चैतन्य महाप्रभु) के अतिप्रिय श्रीश्रीमद् भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर की कृष्ण-सेवा अतुलनीय है। वे ऐसे महान सदगुरु हैं जो सारे विश्वभर के विभिन्न स्थानों में कृष्ण के प्रति प्रगाढ़ भक्ति बाँटते हैं।
3ताँर इच्छा बलवान पाश्चात्येते ठान ठान
होय जाते गौरांगेर नाम।
पृथ्वीते नगरादि आसमुद्र नद नदी
सकलेइ लोय कृष्ण नाम॥
भावार्थउनकी बलवती इच्छा से भगवान् गौरांग का नाम पाश्चात्य जगत के समस्त देशों में फैलेगा। पृथ्वी के समस्त नगरों व गाँवों में, समुद्रों, नदियों आदि सभी में रहनेवाले जीव कृष्ण का नाम लेंगे।
4ताहले आनंद होय तबे होय दिग्विजय
चैतन्येर कृपा अतिशय।
माया दुष्ट जत दुःखी जगते सबाइ सुखी
वैष्णवेर इच्छा पूर्ण हय॥
भावार्थजब श्रीचैतन्य महाप्रभु की अतिशय कृपा सभी दिशाओं में दिग्विजय कर लेगी, तो निश्चित रूप से पृथ्वी पर आनंद की बाढ़ आ जायेगी। जब सब पापी, दुष्ट जीवात्माऐं सुखी होंगी, तो वैष्णवों की इच्छा पूर्ण हो जायेगी।
5से कार्य ये करिबारे, आज्ञा यदि दिलो मोरे
योग्य नाहि अति दीन हीन।
ताइ से तोमार कृपा मागितेछि अनुरूपा
आजि तुमि सबार प्रवीण॥
भावार्थयद्यपि मेरे गुरू महाराज ने मुझे इस अभियान को पूरा करने की आज्ञा दी है, तथापि मैं इसके योग्य नहीं हूँ। मैं तो अति दीन व हीन हूँ। अतएव, हे नाथ, अब मैं तुम्हारी कृपा की भिक्षा मांगता हूँ जिससे मैं योग्य बन सकूँ, क्योंकि तुम तो सभी में सर्वाधिक प्रवीण हो।
6तोमार से शक्ति पेले गुरू-सेवाय वस्तु मिले
जीवन सार्थक जदि होय।
सेइ से सेवा पाइले ताहले सुखी हले
तव संग भाग्यते मिलोय॥
भावार्थयदि तुम शक्ति प्रदान करो, तो गुरू की सेवा द्वारा परमसत्य की प्राप्ति होती है और जीवन सार्थक हो जाता है। यदि वह सेवा मिल जाये तो व्यक्ति सुखी हो जाता है और सौभाग्य से उसे तुम्हारा संग मिल जाता है।
7एवं जनं निपतितं प्रभवाहिकूपे
कामाभिकाममनु यः प्रपतन्प्रसङ्गात्।
कृत्वात्मसात्सुरर्षिणा भगवन्गृहीतः
सोऽहं कथं नु विसृजे तव भृत्यसेवाम्॥
भावार्थहे भगवान् मैं एक-एक करके भौतिक इच्छाओं की संगति में आने से सामान्य लोगों का अनुगमन करते हुए सर्पो के अन्धे कुँए में गिरता जा रहा था। किन्तु आपके दास नारद मुनि ने कृपा करके मुझे अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कर लिया और मुझे यह शिक्षा दी कि इस दिव्य पद को किस प्रकार प्राप्त किया जाय। अतएव मेरा पहला कर्त्तव्य है कि मैं उनकी सेवा करूँ। भला मैं उनकी यह सेवा कैसे छोड़ सकता हूँ? (प्रह्लाद महाराज ने नृसिंह भगवान से कहा, श्रीमद्भागवत 07.09.28 )
8तुमि मोर चिर साथी भूलिया मायार लाठी
खाइयाछी जन्म-जन्मान्तरे।
आजि पुनः ए सुयोग यदि हो योगायोग
तबे पारि तुहे मिलिबारे॥
भावार्थहे भगवान् कृष्ण, आप मेरे चिर साथी हो। तुम्हें भुलाकर मैंने जन्म-जन्मांतर माया की लाठियाँ खायी हैं। यदि आज मुझे सुयोग पुनः प्राप्त हो जाए तो मेरा आपसे पुनर्मिलन अवश्य होगा
9तोमार मिलने भाइ आबार से सुख पाइ
गोचारणे घुरि दिन भोर।
कत बने छुटाछुटि बने खाए लुटापुटि
सेई दिन कबे हबे मोर॥
भावार्थहे भाई, तुमसे मिलकर मुझे फिर से महान सुख का अनुभव होगा। भोर बेला में मैं गोचारण हेतु निकलूँगा। व्रज के वनों में भागता-खेलता हुआ, मैं आध्यात्मिक हर्षोन्माद में भूमि पर लोटूँगा। अहा! मेरे लिए वह दिन कब आयेगा?
10अजि से सुविधान तोमार स्मरण भेलो
बड़ो आशा डाकिलाम ताइ।
आमि तोमार नित्य-दास ताइ करि एत आश
तुमि बिना अन्य गति नाइ॥
भावार्थआज मुझे तुम्हारा स्मरण बड़ी भली प्रकार से हुआ। मैंने तुम्हें बड़ी आशा से पुकारा था। मैं तुम्हारा नित्यदास हूँ और इसलिए तुम्हारे संग की इतनी आशा करता हूँ। हे कृष्ण तुम्हारे बिना मेरी कोई अन्य गति नहीं है।