International Society for Krishna Consciousness

Founder Acharya — HDG A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada

Hare Krishna Hare Krishna, Krishna Krishna Hare Hare
Hare Rama Hare Rama, Rama Rama Hare Hare

Vaishnav Bhajan

कुसुमित वृंदावने नाचतो शिखिगणे

Composed by नरोत्तम दास ठाकुर

1
कुसुमित वृंदावने, नाचतो शिखिगणे, पिक – कुल भ्रमर – झङ्कारे प्रिय सहचरी संगे, गाइया जाइबो रंगे, मनोहर निकुंज – कुटीरे॥
भावार्थश्री वृन्दावन में, खिले हुए पुष्पों, नृत्य करते मयूरों, भ्रमरों की झंकार तथा पक्षियों के कलरव के मध्य मैं अपनी प्रिय सहचरियों के संग गायन करती हुई वन में स्थित मनोहर निकुञ्ज-कुटीर में जाऊँगी।
2
हरि हरि! मनोरथ फलिबे आमारे दुँहुक मंथर गति, कौतुके हेरबो अति, अंग भरि पुलक अंकुरे॥
भावार्थहे भगवान्‌ हरि! मेरा यह मनोरथ कब पूर्ण होगा जब श्रीश्री राधा-कृष्ण की सुन्दर भाव-भंगिमाओं को मैं कौतुक हो निहारूँगी एवं मेरे अंग पुलकित हो उठेंगे।
3
चौदिगे सखीर माझे, राधिकार इंगिते, चिरुणी लइया करे कोरि कुटिल कुंतल सब, बिथारिया आंचडिबो, बनाइबो विचित्र कबरी॥
भावार्थनिज सखियों से घिरी श्री राधिका जब इंगित करेंगी तब मैं अपने हाथ में कंघी लेकर सावधानीपूर्वक उनके घुँघराले केशों को विचित्र रीति से सँवारूँगी।
4
मृगमद, मलयज, सब अंगे लेपिबो, पराइबो मनोहर हार चंदन कुंकुमे, तिलक बसाइबो, हेरबो मुख – सुधाकर॥
भावार्थमैं उनके श्री अंगों को चन्दन एवं कस्तूरी से लेपित करूँगी तथा उनको सुन्दर फूलमाला अर्पित करूँगी। तत्पश्चात्‌ श्रीश्री राधा-कृष्ण को चन्दन एवं कुमकुम से निर्मित तिलक लगाते हुए, मैं उनके चन्द्रमुखों को लज्जापूर्वक निहारूँगी।
5
नील पट्टांबर, जतने पराइबो, पाये दिबो रतन मंजीरे भृंगारेर जले रांगा, चरण धोयाइबो, मुछबो आपन चिकुरे॥
भावार्थमैं, सावधानीपूर्वक, राधारानी को नीले रेशमी वस्त्रों से अलंकृत करूँगी तथा उनके चरणकमलों में रत्न -जड़ित स्वर्ण निर्मित नूपुर पहनाऊँगी। मैं पात्र में रखे हुए जल से उनके चरणकमल प्रक्षालित करूँगी तथा उन्हें अपने केशों से पोंछकर सुखाऊँगी।
6
कुसुमक नव – दले, शेज बिछाइबो, शयन कराबो दोंहाकारे धवल चामर आनि, मृदु मृदु बीजबो, छरमित दुँहुक शरीरे॥
भावार्थकमल-दल से सुशोभित सुन्दर शय्या बिछाकर, मैं उनसे शयन करने का निवेदन करूँगी। तब मैं उनके हेतु श्वेत चामर मृदु-मृदु ढुलाऊँगी।
7
कनक संपुट कोरि, कर्पूर तांबुल भरि, जोगाइबो दोंहार वदने अधर सुधा – रसे, तांबुल सुवासे, भुंजबो अधिक जतने॥
भावार्थमैं एक छोटे-से-स्वर्ण निर्मित सन्दूक से कर्पूर एवं पुंगीफल (सुपारी) से बना सुगन्धित ताम्बूल उनके मुखारविन्द में अर्पित करूँगी, इस प्रकार उन्हें प्रसन्नचित्त देखूँगी।
8
श्रीगुरु करुणासिन्धु, लोकनाथ दीन – बंधु, मुइ दीने कर अवधान राधाकृष्ण वृंदावन, प्रिय – नर्म – सखीगण, नरोत्तम मागे एइ दान॥
भावार्थहे मेरे गुरुदेव श्रील लोकनाथ गोस्वामी आप करुणासिन्धु एवं दीन-हीन जनों के मित्र हैं। हे मेरे स्वामी, कृपया इस दीन पर अपनी दया-दृष्टि डालें तथा इसे श्रीश्री राधा-कृष्ण, श्री वृन्दावन धाम, तथा श्री कृष्ण की अतिशय प्रिया सखियों की सेवा करने की कृपा प्रदान करें। श्रील नरोत्तमदास ठाकुर भिक्षा की याचना करते हैं।