International Society for Krishna Consciousness

Founder Acharya — HDG A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada

Hare Krishna Hare Krishna, Krishna Krishna Hare Hare
Hare Rama Hare Rama, Rama Rama Hare Hare

Vaishnav Bhajan

मुनीन्द्रवृन्दवन्दिते (श्री राधा - कृपा-कटाक्ष स्तोत्र)

Composed by भगवान्‌ शिव

1
मुनीन्द्रवृन्दवन्दिते त्रिलोक शोकहारिणी प्रसन्नवक्त्रपङ्गजे निकुंजभुविलासिनि। व्रजेन्द्रभानुनन्दिनि व्रजेन्द्रसुन सङ्गते कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम्॥
भावार्थहे देवी, संतो द्वारा पूजित, हे देवी, जो तीनों लोकों के दुख-कष्टों को दूर करती हैं, हे देवी, जिनका मुख खिले हुए कमल पुष्प के समान है, हे देवी जो वन में लीलाओं का आनन्द उठाती हैं, हे वृषभानुजी की पुत्री, हे व्रज के राजकुमार की संगिनी, आप कब अपनी दयापूर्ण तिरछी नजर मुझ पर डालेंगी?
2
अशोकवृक्षवल्लरीवितान मण्डपस्थिते प्रवालवालपल्लव प्रभाऽरूणांघ्रि कोमले। वराभयस्फुरत्‌करे प्रभुतसम्पदालये कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम्॥
भावार्थहे देवी, एक अशोक वृक्ष के पास लताओं द्वारा बनी कुटिया में रहने वाली, हे देवी जिनके नाजुक पाँव या चरण लाल खिलते फूलों के समान वैभवशाली हें, हे देवी जिनके हाथ निर्भयता प्रदान करते हैं, हे दिव्य ऐश्वर्यों का निवास स्थान या धाम, आप कब अपनी दयामयी दृष्टि मुझ पर डालेंगी?
3
अनङ्गरङ्गमङ्गलप्रसङ्गभंगुरभ्रुवां सविभ्रमं समंम्भ्रमं दृगन्तबाणपातनै। निरन्तरं वशीकृत-प्रतीतिनन्दनन्दने कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम्॥
भावार्थहे देवी, जिन्होंने अपनी शुभ व मंगलमय, श्रृंगार रस से पूर्ण भौंहों रूपी वक्राकार धनुष से, अपनी नजर रूपी तीरों को विनोदपूर्ण रीति से छोड़ते हुए, नन्द के पुत्र (कृष्ण) को परास्त करके पूर्णतः नियंत्रित कर लिया है, आप कब अपनी दयामयी तिरछी नजर मुझ पर डालेंगी?
4
तडितसुवर्णचम्पकप्रदीप्तगौरविग्रहे मुखप्रभापरास्तकोटिशारदेन्दुमण्डले। विचित्र चित्रसंचरच्चकोरशावलोचने कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम्॥
भावार्थहे देवी जिनका रूप चम्पक पुष्प, स्वर्ण और कड़कती बिजली के समान वैभवपूर्ण है। जिनका मुख पतझड़ ऋतु के करोड़ों चन्द्रमाओं पर भी ग्रहण लगा देता है और जिनके नेत्र अद्‌भुत, आश्चर्यजनक, अधीर तरुण चकोर पक्षियों के समान हैं, आप कब अपनी दयामयी तिरछी नजर या दृष्टि मुझ पर डालेगी?
5
मदोन्मदातियौवने प्रमोदमानमण्डिते प्रियानुरागरञ्जिते कलाविलासपण्डिते। अनन्यधन्यकुञ्जराज्यकाम केलिकोविदे कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम्॥
भावार्थहे उत्साह-उल्लास के नशे में मद किशोर कन्या, प्रसन्नचित से सुसज्जित, जो अपने प्रियतम कृष्ण से अत्यधिक भावावेश में प्रेम करती है। हे क्रीड़ाजनक कलाओं में निपुण देवी, वृन्दावन के अद्वितीय व अनुपम ऐश्वर्यपूर्ण वन के निकुंजो के राज्य में श्रृंगार रस पूर्ण लीलाओं का आनन्द उठाने में कुशल देवी, आप कब अपनी दयामयी दृष्टि मुझ पर भी डालेगी?
6
अशेषहावभावधीरहीरहारभूषिते प्रभूतशातकुम्भ-कुम्भ-कुम्भि-कुम्भसुस्तनि। प्रशस्तमन्दहास्यचूर्णपुर्णसौख्यसागरे कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम्॥
भावार्थसुस्पष्ट उद्यमितापूर्ण श्रृंगार रस की हल्की झलक लिए मोतियों के हार से सुशोभित देवी, स्वर्ण के समान गोरी देवी। जिनके वक्ष महान स्वर्णिम जलपात्रों के सदृश हैं, हे मंद मुस्कान के सुगंधित चूर्ण से पूर्ण प्रसन्नता का सागर, आप कब अपनी दयामयी तिरछी नजर मुझ पर डालेंगी?
7
मृणालवालवल्लरी तरङ्गरङ्गदोर्लते लताग्रलास्यलोलनीललोचनावलोकने। ललल्ललुन्मिलन्मनोज्ञ मुग्धमोहनोश्रिते कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम्॥
भावार्थहे देवी जिनकी भुजायें लहरों पर नृत्य करती कमल पुष्पों की डंडियो के समान है, हे देवी जिनके काले नेत्र नृत्य करती लताओं की सदृश हैं, हे विनोदपूर्ण, सुन्दर, मनमोहक देवी, आप कब अपनी दयामयी तिरछी नजर मुझ पर डालेंगी?
8
सुवर्णमालिकाच्चितत्रिरेखकम्बुकण्ठगे त्रिसूत्रमङ्गलीगुणत्रिरत्नदीप्तिदीधिति। सलोलनीलकुन्तल प्रसुनगुच्छगुम्फिते कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम्॥
भावार्थहे देवी जो अपनी गर्दन रूपी तीन रेखाओं वाले शंख में स्वर्ण का हार पहनती हैं तीन जास्मिन पुष्प मालाओं और तीन रत्नजड़ित होरों से शोभित हे देवी जिनकी कालें बालों की हिलती लटें, फूलों के गुच्छों से सुसज्जित हैं, आप कब अपनी दयामयी दृष्टि मुझ पर भी डालेगी?
9
नितम्बबिम्बलम्बमानपुष्पमेखलागुणे प्रशस्त रत्नकिङ्ग्किणीकलापमध्य मञ्जुले। करीन्द्रशुण्डदण्डिकावराहसौभगोरूके कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम्॥
भावार्थजो अपने वक्राकार कूल्हों पर पुष्पों का कमरबंद पहनती हैं, और रत्नमणियों के घुंघरुओं की ध्वनि करता कमरबंद पहनकर आकर्षक लगनेवाली हे देवी, जिनकी सुन्दर जाँघे, राजसी हाथियों की सूँड को भी मात देने वाली हैं, आप कब अपनी दयामयी तिरछी नजर मुझ पर डालेंगी?
10
अनेकमन्त्रनादमञ्जुनुपुरारवस्खलत्‌ समाजराजहंसवंशनिक्कणातिगौरवै। विलोलहेमवल्लरीविडम्बिचारू चङ्‌क्रमे कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम्॥
भावार्थहे देवी जिनकी पायल के नुपुर की ध्वनि कई मंत्रों और कई राजसी हंसों की आवाज से भी अधिक सुन्दर है, और जिनकी मनोरम एवं लालित्यपूर्ण चाल, हिलती हुई स्वर्ण बेलों को भी परास्त कर देती है, आप कब अपनी दयामयी तिरछी नजर मुझ पर डालेंगी?
11
अनन्तकोटिविष्णुलोकनम्रपद्मजार्चिते हिमाद्रिजापुलोमजाविरिंचजावरप्रदे। अपारसिद्धिऋद्धिदिग्धसत्पदांगुलीनखे कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम्॥
भावार्थब्रह्माजी द्वारा पूजी जाने वाली हे देवी जिनके चरणों में असंख्य करोड़ो वैष्णव जन झुकते हैं। जो पार्वती, शची और सरस्वती को भी आशीर्वाद देती हैं, जिनके पाँव के नख असीम ऐश्वर्यों एवं योग सिद्धियों से मण्डित हैं, आप कब अपनी दयामयी तिरछी नजर मुझ पर डालेंगी?
12
मखेश्वरि क्रियेश्वरि स्वधेश्वरि सुरेश्वरि त्रिवेदभारतीश्वरि प्रमाणशासनेश्वरि। रमेश्वरि क्षमेश्वरि प्रमोद काननेश्वरि व्रजेश्वरि व्रजाधिपे श्रीराधिके नमोऽस्तुते॥
भावार्थहे वैदिक यज्ञों की रानी, हे पुण्य कार्यों की रानी, हे भौतिक जगत्‌ की रानी, हे देवताओं की रानी, हे वैदिक विद्वता (छात्रवृत्ति) की रानी, हे ज्ञान की रानी, हे भाग्य की लक्ष्मियों की रानी, हे धैर्य की रानी, हे वृन्दावन की रानी, प्रसन्नता का वन, हे व्रज की रानी, हे व्रज की सम्राज्ञी, हे श्रीराधिका, आपको प्रणाम है!
13
इतीममदभुतंस्ववं निशम्य भानुनन्दिनी करोतु सन्ततं जनं कृपाकटाक्षभाजनम्। भवेत्तदैवस िञ्चतत्रिरूपकर्मनाशनं भवेत्तदाव्रजेन्द्रसनमण्डलप्रवेशनम्॥
भावार्थएक भक्त द्वारा पढ़े जाने पर, मेरी इस अत्यन्त आश्चर्यजनक एवं विस्मयकारी प्रार्थना को सुनकर, श्रीवृषभानु-नन्दिनी (श्री वृषभानुजी की पुत्री श्रीमती राधारानी) अपनी अत्यन्त दयालु तिरछी नजर का लक्ष्य, निरन्तर उन्हें बनाए। उस समय, उसके समस्त कर्मफल-चाहे परिपक्व अवस्था में हो, फलीभूत होने वाले हों, या बीज अवस्था में पड़ें हों- पूर्ण रूप से नष्ट हो जाऐंगे, और तब वह नन्दनंदन (नंदजी के पुत्र श्रीकृष्ण) के नित्य प्रेमी पार्षदों की सभा में प्रवेश प्राप्त कर लेंगे।
14
राकायां च सिताष्टम्यां दशम्यां च विशुद्धधोः। एकादश्यां यः त्रयोदश्यां यः पठेत्साधकः सुधीः॥
भावार्थयदि एक साधक, शुद्ध बुद्धि के साथ, अपना मन चंद्रमास के विशेष दिनों पर अपने मन को स्थिर करके इस स्तव का पाठ करता है, विशेष दिन जैसे पूर्णमासी दिवस, अष्टमी, दशमी, एकादशी और त्रयोदशी के दिन,
15
यं यं कामयते कामं तं तं प्राप्नोति साधकः। राधाकृपाकटाक्षेण भक्तिः स्यात्‌ प्रेमलक्षणा॥
भावार्थतब उसकी प्रत्येक इच्छा एक-एक करके परिपूर्ण हो जाएगी और श्रीराधा का दयालु कटाक्ष के नजर द्वारा, वह ऐसी भक्ति प्राप्त करेगा जो भगवान्‌ के शुद्ध, परमानन्द प्रेम भाव से ओतप्रोत, विशेष लक्षण वाली होगी।
16
उरूदघ्ने नाभिदघ्ने हृद्‌दघ्ने कण्ठदघ्ने च। राधाकुण्डजले स्थित्वा यः पठेत्‌साधकः शतम्॥
भावार्थवह साधक जो श्रीराधा-कुण्ड के जल में अपनी जाँघे, नाभि, वक्ष या गर्दन तक डूबा हुआ खड़े रहकर इस स्तव का सौ बार पाठ करता है, वह मनुष्य के पाँच लक्ष्यों में पूर्ण सिद्धि प्राप्त कर लेगा, जिनके नाम है धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष और प्रेम।
17
तस्य सर्वार्थसिद्धिः स्यात्‌ वाक्सामर्थ्य ततो लभेत्। ऐश्वर्य च लभेत्साक्षाद्‌दृशा पश्यति राधिकाम्॥
भावार्थवह ऐसी शक्ति भी प्राप्त करेगा जिसके द्वारा वह जो भी कहेगा सत्य हो जाएगा। वह दिव्य राजसत्ता प्राप्त करने के कारण बहुत अधिक शक्तिशाली और समृद्ध बन जाएगा, और वह अपनी वर्तमान भौतिक नेत्रों द्वारा, श्रीराधिका को देखकर, आमने-सामने उनसे मिल सकेगा।
18
तेन सा तत्क्षणादेव तुष्टा दत्ते महावरम्। येन पश्यति नत्राभ्यां तत्प्रियं श्यायसुन्दरम्॥
भावार्थराधा-कुण्ड में इस प्रार्थना का इस प्रकार उच्चारण करने के द्वारा श्रीराधिका इतनी अधिक प्रसन्न हो जाती हैं कि वे तुरन्त ही भक्त को एक महान वरदान प्रदान कर देती है, जो यह है कि वह अपने ही नेत्रों द्वारा राधाजी के प्रियतम श्यामसुन्दर के दर्शन कर लेता है।
19
नित्यलीलाप्रवेशं च ददाति हि व्रजाधिपः। अतः परतरं प्राप्यं वैष्णवानां न विद्यते॥
भावार्थतब वृन्दावन के वे भगवान्‌ भक्त को उनकी नित्य लीलाओं में प्रवेश करवाते हैं। असली प्रामाणिक वैष्णव जन इससे परे किसी भी और वस्तु के लिए लालायित नहीं होते।