1प्रलयपयोधिजले धृतवानसि वेदं
विहितवहित्र चरित्रमखेदम्
केशव! धृत-मीनशरीर! जय जगदीश हरे!॥
भावार्थहे केशव! हे जगदीश! हे मीन का शरीर धारण करने वाले श्री हरि! तुम्हारी जय हो! प्रलय के प्रचंड समुद्र के जल में डूबे हुए वेदों का उद्धार करने हेतु तुमने भीमकाय मीन का रूपधारण करके नौका-जैसा अभिनय किया।
2क्षितिरिह विपुलतरे तिष्ठति तव पृष्ठे
धरणीधरणकिण-चक्रगरिष्ठे
केशव! धृत-कूर्मशरीर! जय जगदीश हरे!॥
भावार्थहे केशव! हे जगदीश! हे कच्छप का शरीर धारण करने वाले श्री हरि! तुम्हारी जय हो! दिवय कच्छप के रूपवाले तुम्हारे इस अवतार में तुम श्रीर समुद्र के मंथन हेतु मंदराचल को अपने विशाल पृष्ठभाग पर धारण करते हो, जिसके कारण तुम्हारे पृष्ठभाग पर गड्ढे जैसा बड़ा चिन्ह बन गया है।
3वसति दशनशिखरे धरणी तव लग्ना
शशिनि कलङ्गकलेव निमग्ना।
केशव! धृतशूकररूप! जय जगदीश हरे!॥
भावार्थहे केशव! हे जगदीश! हे वराह का रूप धारण करने वाले श्री हरि! तुम्हारी जय हो! जो पृथ्वी ब्रह्माण्ड के तल पर गर्भोदक सागर में डुब गई थी, वह चंद्रमा पर धब्बे के समान तुम्हारे दांत के अग्रभाग में स्थित रहती है।
4तव करकमलवरे नखमद्भुत-श्रृङ्गं
दलितहिरण्यकशिपुतनु-भृङ्गम्।
केशव! धृत-नरहरिरूप जय जगदीश हरे!॥
भावार्थहे केशव! हे जगदीश! हे नृसिंह रूप धारण करनेवाले श्री हरि! तुम्हारी जय हो। जैसे कोई अपने नखों के बीच भ्रमर को सरलतापूर्वक मसल देता है उसी प्रकार तुमने भी अपने सुदर हस्तकमल के अद्भुत नुकीले नखों द्वारा भ्रमररूप हिरण्यकशिपु के शरीर को विदीर्ण कर दिया।
5छलयसि विक्रमणे बलिमद्भुतवामन
पदनखनीरजनितजनपावन।
केशव! धृत-वामनरूप! जय जगदीश हरे!॥
भावार्थहे केशव! हे जगदीश! वामनरूप धारण करने वाले श्री हरि! तुम्हारी जय हो! हे अद्भुत बौने, अपने लम्बे पगों से आपने महाराज बलि को छला, तथा अपने चरणकमल के नख से उत्पन्न हुए गंगाजल से तुम इस संसार की सब जीवात्माओं को पावन करते हो।
6क्षत्रियरुधिरमये जगदपगतपापं
स्नपयसि पयसि शमितभवतापम्।
केशव! धृत-भृगुपतिरूप! जय जगदीश हरे!॥
भावार्थहे केशव! हे जगदीश! हे भृगुपति (परशुराम) का रूप धारण करने वाले श्री हरि! तुम्हारी जय हो! कुरूक्षेत्र में तुम अपने द्वारा हताहत किए गए आसुरी क्षत्रियों के शरीरों से उत्पन्न रक्त की नदियों से धरती को स्नान कराते हो। तुम जगत के पाप धोते हो, और तुम्हारे कारण सब लोग भौतिक अस्तित्व की दावाग्नि के ताप से मुक्ति पाते हैं।
7वितरसि दिक्षु रणे दिक्पतिकमनीयं
दशमुखमौलिबलिं रमणीयम्।
केशव! धृत-रामशरीर जय जगदीश हरे!॥
भावार्थहे केशव! हे जगदीश! हे रामचंद्र का रूप धारण करने वाले श्री हरि! तुम्हारी जय हो! लंका के युद्ध में तुम दशमुख राक्षस का वध करते हो तथा उसके सिरों को दसों दिशाओं के दिग्पालों को रमणीय व वांछनीय उपहार स्वरूप वितरण करते हो!
8वहसि वपुषी विशदे वसनं जलदाभं
हलहतिभितिमिलित यमुनाभम्।
केशव! हलधररूप! जय जगदीश हरे!॥
भावार्थहे केशव! हे जगदीश! हे हलधरधारी बलराम का रूप धारण करने वाले श्री हरि! तुम्हारी जय हो! अपने उज्जवल गोरवर्ण देह पर आप सजल-जलद के समान नीलाम्बर पहनते हो। वह नीलाम्बर तुम्हारे हल के प्रहार से भयभीत हुई यमुना नदी के सुँदर गहरे रंग जैसा प्रतीत होता है।
9निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातं
सदयहृदय! दर्शित-पशुघातम्।
केशव! धृत-बुद्धशरीर! जय जगदीश हरे!॥
भावार्थहे केशव! हे जगदीश! हे बुद्ध का शरीर धारण करने वाले श्री हरि! तुम्हारी जय हो! तुम्हारा हृदय दया से परिपूर्ण है, तुम वैदिक यज्ञ-विधि की आड़ में सम्पन्न पशुओं की हिंसा की निंदा करते हो।
10म्लेच्छनिवहनिधने कलयसि करवालं
धूमकेतुमिव किमपि करालम्।
केशव! धृतकल्किशरीर! जय जगदीश हरे!॥
भावार्थहे केशव! हे जगदीश! हे कल्कि रूप धारण करने वाले श्री हरि! तुम्हारी जय हो! कलियुग के अंत में दुष्ट म्लेच्छ व्यक्तियों विनाश हेतु तुम धूमकेतु के समान प्रतीत होते हुए कराल तलवार लिए रहते हो।
11श्रीजयदेवकवेरिदमुतिदतमुदारं
श्रृणु सुखदं शुभदं भवसारम्।
केशव! धृतदशविधरूप! जय जगदीश हरे!॥
भावार्थहे केशव! हे जगदीश! हे दस प्रकार के अवतार धारण करने वाले श्री हरि! तुम्हारी जय हो! हे पाठकों, श्री जयदेव कवि द्वारा रचित इस स्तोत्र को तुम प्रेमपूर्वक सुनते रहो! यह स्तोत्र अत्युत्तम है, सुखद मंगलकारी है तथा इस अंधकारमय जगत में सर्वश्रेष्ठ है।
12श्रीदशावतार प्रणाम
वेदानुद्धरते जगन्ति वहते भूगोलमुद्विभ्रते
दैत्यं दारयते बलिं छलयते क्षत्रक्षयं कुर्वते।
पौलस्त्यं जयते हलं कलयते कारुण्यमातन्वते
म्लेच्छान्मूर्च्छयते दशाकृतिकृते कृष्णाय तुभ्यं नमः॥
भावार्थहे दश-अवतार धारण करने वाले श्री कृष्ण! मैं तुम्हें कोटिशः नमन करता हूँ। मत्स्य रूप से तुम वेदों का उद्धार करनेवाले हो, कूर्मरूप से अपनी पीठ पर मंदराचल पर्वत धरने वाले हो, वराह रूप से पृथ्वी को अपने दातों में उठाने वाले हो, नृसिंह रूप से हिरण्यकशिपु दैत्य की छाती विदीर्ण करने वाले हो, वामन रूप से तीन पग भूमि मांगकर दैत्यराज बलि को दलकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड नापने वाले हो, परशुराम रूप से दुष्ट क्षत्रियों का संहार करने वाले हो, रामरूप से राक्षसराज रावण को जीतने वाले हो, बलराम रूप से दुष्टदलनकारी हल धारण करने वाले हो, बुद्धरूप से पीड़ित जीवों पर दया दिखने वाले हो, एवं कलियुग के अंत में कल्किरूप से म्लेच्छों को मूर्च्छित करनेवाले हो।