1हरि हे!
प्रपञ्चे पडिया, अगति हइया,
ना देखि उपाय आर
अगतिर गति, चरणे शरण,
तोमाय करिनु सार॥
भावार्थहे भगवान् हरि! मैं इस भौतिक संसार में गिर गया हूँ तथा पूर्णरूपेण पथभ्रष्ट हूँ। वस्ततुः, मुझे मेरे उद्धार का कोई भी उपाय नहीं दीखता। अतएव, मैं आपके चरणकमलों का आश्रय ग्रहण करता हूँ। अनाथों की एकमात्र शरण आप ही हैं।
2करम गेयान, किछु नाहि मोर,
साधन भजन नाइ
तुमि कृपामय, आमि त’ कांगाल,
अहैतुकी कृपा चाइ॥
भावार्थन तो मेरे पास पुण्य कर्मो की पूँजी है और न ही आध्यात्मिक ज्ञान है। मैं आध्यात्मिक उन्नति तथा परम् भगवान् की आराधना से विहीन हूँ। आप परम् दयालु हैं तथा मैं कंगाल, पतित हूँ। अतएव, मैं आपकी अहैतुकी कृपा की भिक्षा माँगता हूँ।
3वाक्य – मनो – वेग, क्रोध – जिह्वा – वेग,
उदर – उपस्थ – वेग
मिलिया ए सब, संसारे भासाये,
दितेछे परमोद्वेग॥
भावार्थमैं निरन्तर वाणी, मन, क्रोध, जिह्वा, उदर तथा उपस्थ के वेगों द्वारा वयाकुल रहता हूँ। यह सब एकसाथ मुझे भौतिक संसार की तरंगों में डाल रहे हैं, अतएव मेरे लिए अत्यन्त वयग्रता उत्पन्न कर रहे हैं।
4अनेक यतने, से सब दमने,
छाडियाछि आशा आमि
अनाथेर नाथ! डाकि तव नाम,
एखन भरसा तुमि॥
भावार्थमैनें इस वेगों को नियन्त्रित करने के निजी पय्रास त्याग दिए हैं। हे अनाथों के नाथ! अब मैं आपके पवित्र नाम का जप-कीतर्न करता हूँ क्योंकि आप ही मरे एकमात्र आशा हैं।