1राधा-कुंड-तट-कुंज-कुटीर।
गोवर्धन-पर्वत, यामुन-तीर॥
भावार्थराधा-कुण्ड का तट, राधा-कुण्ड के चारोंओर कुंज, गिरि गोवर्धन, यमुना का तट...
2कुसुम-सरोवर, मानस-गंगा।
कलिन्द-नन्दिनी विपुल-तरंगा॥
भावार्थकुसुम सरोवर, मानसी गंगा, यमुना (जो कि कलिंद की पुत्री हैं) की विशाल तरंगें...
3वंशी-वट, गोकुल, धीर-समीर।
वृन्दावन-तरु-लतिका-बानीर। ॥
भावार्थ... वंशीवट, गोकुल, तथा धीर-समीर साथ-ही-साथ वृन्दावन के वृक्ष, लताएँ, एवं कुंज...
4खग-मृग-कुल, मलय-बातास।
मयूर, भ्रमर, मुरली, विलास॥
भावार्थपक्षी, हिरण, शीतल मन्द पवन, मोर, भँवरें, वंशी की मधुर ध्वनि ...
5वेणु, शृंग, पद-चिन्ह मेघमाला।
वसन्त, शशांक, शंख, करताला॥
भावार्थ... वंशी, सींग, चरण-चिन्ह, मेघ (बादल), वसंत, चन्द्रमा, शंख तथा करताल...
6युगल-विलासे अनुकूल जानि।
लीला-विलास उद्दीपक मानि॥
भावार्थ... यह समस्त वस्तुएँ दिवय-युगल श्रीश्रीराधा-कृष्ण की भक्ति के अनुकूल हैं। अतएव, मैं इन समस्त वस्तुओं को भगवान् की लीला-वृद्धि में सहायक मानता हूँ।
7ए-सब छोड़त कहि नाहि याउँ।
ए-सब छोड़त पराण हाराउँ॥
भावार्थमैं इन सब वस्तुओं के बिना नहीं जी सकता। यदि मैं इन्हें त्याग दूँ तो निश्चित ही मेरी मृत्यु हो जाएगी।
8भकतिविनोद कहे, शुन कान!
तुया उद्दीपक हामारा पराण॥
भावार्थश्रील भक्तिविनोद ठाकुर कहते हैं, “हे कृष्ण! जिस भी किसी वस्तु से मुझे आपका स्मरण होता है, वह मेरा जीवन एवं प्राण है। ”