1सतां निन्दा नाम्नः परममपराधं वितनुते
यतः ख्यातिं यातं कथमु सहते तद्विगर्हाम्
भावार्थभगवान्नाम के प्रचार में सम्पूर्ण जीवन समर्पित करने वाले महाभागवतों की निन्दा करना।
2शिवस्य श्रीविष्णोर्य इह गुणनामादिसकलं
धिया भिन्नं पश्येत्स खलु हरिनामाहितकरः
भावार्थशिव, ब्रह्मा आदि देवों के नाम को भगवान्नाम के समान अथवा उससे स्वतन्त्र समझना।
3गुरोरवज्ञा
भावार्थगुरु की अवज्ञा करना अथवा उन्हें साधारण मनुषय समझना।
4श्रुति शास्त्र निन्दनम्
भावार्थवैदिक शास्त्रों अथवा प्रमाणों का खण्डन करना।
5हरिनाम्नि कल्पनम्
भावार्थहरे कृष्ण महामन्त्र के जप की महिमा को काल्पनिक समझना।
6अर्थवादः
भावार्थपवित्र भगवन्नाम में अर्थवाद का आरोप करना।
7नाम्नो बलाद्यस्य हि पापबुद्धिर्
न विद्यते तस्य यमैर्हि शुद्धिः
भावार्थनाम के बल पर पाप करना।
8धर्मव्रतत्यागहुतादिसर्व
शुभक्रियासाम्यमपि प्रमादः
भावार्थहरे कृष्ण महामन्त्र के जप को वेदों में वर्णित एक शुभ सकाम कर्म (कर्मकाण्ड) के समान समझना।
9अश्रद्दधाने विमुखेऽप्यशृण्वति
यश्चोपदेशः शिवनामापराधः
भावार्थअश्रद्धालु व्यक्त्ति को हरिनाम की महिमा का उपदेश करना।
10श्रुत्वापि नाममाहात्म्यं यः प्रीतिरहितोऽधमः
अहंममादिपरमो नाम्नि सोऽप्यपराधकृत्
अपि प्रमादः
भावार्थभगवन्नाम के जप में पूर्ण विश्वास न होना और इसकी इतनी अगाध महिमा श्रवण करने पर भी भौतिक आसक्ति बनाये रखना।
भगवन्नाम का जप करते समय पूर्ण रूप से सावधान न रहना भी अपराध है। प्रत्येक वैष्ण्व भक्त को चाहिए कि इन दस प्रकार के अपराधों से सदा बच कर रहे, ताकि श्रीकृष्ण के चरण कमलों में प्रेम शीघ्रातिशीघ्र प्राप्त हो, जो मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य है।