1वृंदावनवासी यत वैष्णवेर गण।
प्रथमे वंदना करि सबार चरण॥
भावार्थवृन्दावनवासी जितने भी वैष्णव हैं, सर्वप्रथम मैं उनके चरणो की वन्दना करता हूँ।
2नीलाचलवासी यत महाप्रभुर गण।
भूमिते पड़िया वन्दो सभार चरण॥
भावार्थनीलाचलवासी जितने भी महाप्रभु के गण हैं, पृथ्वी पर लेटकर मैं सबके चरणों की वन्दना करता हूँ।
3नवद्वीपवासी यत महाप्रभुर भक्त।
सभार चरण वन्दों हञा अनुरक्त॥
भावार्थनवद्वीपवासी जितने भी महाप्रभु के भक्त हैं, दण्डवत् प्रणाम करता हुआ सभी के चरणों की मैं वन्दना करता हूँ।
4महाप्रभुर भक्त यत गौड़ देशे स्थिति।
सभार चरण वन्दों करिया प्रणति॥
भावार्थगौड़ देश वासी महाप्रभु के जितने भी भक्त हैं, सभी के चरणों में शरणागत होकर मैं उनकी वन्दना करता हूँ।
5ये-देशे, ये देशे वैसे गौरांगेर गण।
ऊर्ध्वबाहु करि’ वन्दों सबार चरण॥
भावार्थइसके अलावा जिस-जिस स्थान पर भी गौरांग महाप्रभु जी के गण हैं, अपने दोनों हाथ उठाकर मैं उनके चरणों की वन्दना करता हूँ।
6हञाछेन हइबेन प्रभुर यत दास।
सभार चरण वन्दो दन्ते करि घास॥
भावार्थभगवान् के जितने भी भक्त हो चुके हैं या होंगे, मैं दाँतों में घास का तिनका लेकर अर्थात् दीनता के साथ सभी के चरणों की वन्दना करता हूँ।
7ब्रह्माण्ड तारिते शक्ति धरे जने-जने।
ए वेद-पुराणे गुण गाय येबा शुने॥
भावार्थएक-एक भक्त पूरे के पूरे ब्रह्माण्ड को उद्धार करने की सामर्थ्य रखता है - ऐसा सुना जाता हे कि वेद व पुराण इनका इस प्रकार से बखान करते हैं।
8महाप्रभुर गण सब पतितपावन।
ताइ लोभे मुञि पापी लइनु शरण॥
भावार्थश्रीचैतन्य महाप्रभु जी के सभी भक्त पतितों को पावन करने वाले हैं, इसी लोभ से मुझ जैसे पापी ने भी उनकी शरण ग्रहण की है।
9वन्दना करिते मुञि कत शक्ति धरि।
तमो-बुद्धिदोषे मुञि दम्भ मात्र करि॥
भावार्थवन्दना करने की मैं भला कितनी शक्ति रखता हूँ। तमोगुणी बुद्धि के इस दोष के कारण मैं तो वैष्णवों की वन्दना करने का मात्र दम्भ ही करता हूँ।
10तथापि मूकेर भाग्य मनेर उल्लास।
दोष क्षमि’ मो-अधमे कर निज दास॥
भावार्थतब भी इस गूँगे के ये सुन्दर भाग्य हैं कि इसके मन में उल्लास है। आप कृपा करके मेरे दोषों को क्षमा करके इस अधम को अपना दास बना लीजिये।
11सर्ववांच्छासिद्धि हय, यमबंध छूटे।
जगते दुर्लभ हञा प्रेमधन लूटे॥
भावार्थआपका दासत्त्व मिल जाने से, जितनी भी इच्छायें हैं, सब पूर्ण हो जाती है। यमराज जी का बन्धन छूट जाता है तथा इस जगत् में जो दुर्लभ वस्तु है- ‘प्रेमधन’ वह उसे लूटता रहता है।
12मनेर वासना पूर्ण अचिराते हय।
देवकीनन्दन दास एइ लोभे कय॥
भावार्थमन की वासना बहुत जल्दी पूर्ण हो जाती है। देवकीनन्दन दास कहते हैं कि मैं इसी लोभ से वैष्णव महिमा कहता हूँ।