दुर्लभ मनुष्य जन्म मिला है, इसे यूं ना गवाईए भक्ति कीजिए और अपने घर वापस लोट जाइए।
क्या जाएगा साथ, क्या रह जायेगा, थोड़ा हिसाब तो लगाइए भौतिक धन तो बहोत कमाया, अब वास्तविक धन हरिनाम भी कमाइए।
ना जाने कितने शरीर बदले है? अब रुक भी जाइए आत्मा को भी पोषण दीजिए, केवल पिंजरा न सजाइए।
बहुत कष्ट सहे है आत्मा ने, अब इसे और न सताइए सच का सामना कीजिए, मरुस्थल में जल की आस न लगाइए।
क्या उद्देश्य है जीवन का? कभी ये सवाल भी उठाइए भगवान को तो सभ मानते है, कभी भगवान की बात भी मान जाइए।
हृदय है भगवान का भगवदगीता, इसे अपने हृदय से लगाइए केवल शपत के लिए ही नहीं, इसे अपने जीवन का हिस्सा भी बनाइए।
जो कभी नही छोड़ते आपका साथ, उससे दूर मत जाइए, इस जगत में मित्र बहुत बनाए, अभ सच्चे मित्र से हाथ तो मिलाए।
दो ही तरह के लोग है जनाब, दोनो में से एक बन जाइए शास्त्रों का पालन करके सूर, या अवज्ञा करके असुर बंजाइए।
कुछ तो लोग कहेंगे, लोगो को बातो में न आइए जीवन को सफल बनाना है, तो सत्संग से जुड़ जाइए।
जरूर संसार के रिश्तों को निभाइए, पर संसार को अपने अंदर मत लाइए जैसे पानी में रहकर भी जल से प्रभावित नहीं होते इसे कलम बन जाइए।
थोड़ा सुख ज्यादा दुख, या हमेशा का सुख चाहिए? शाश्वत आनंद चाहिए तो आनंद के स्त्रोत कृष्ण से संबंध बनाइए।
अच्छे कर्म और बुरे कर्म के ताने बाने में उलझ मत जाइए अकर्म करके सभी तरह के बंधनों से मुक्त हो जाइए।
कई जन्मों से माया की गुलामी की है, अब आजाद भी हो जाइए कृष्ण की शरण लेकर, अंधेरे से प्रकाश की ओर आइए।
खाली करना पड़ेगा ये किराए का मकान साहेब, नए मकान का पता तो लगाइए इट पत्थर से बने मकान मे नही, अब चिंतामणि से बने धाम की ओर जाइए।
भगवदप्रापती के लिए जीवन में गुरु तो चाहिए जिसकी डोर हो गुरु के हाथ, ऐसी पतंग बन जाइए।
साधुसंग में ही भजन संभव है, आप भी इसे आजमाइए कई बद्धजीवो ने भवपर किया है, अब आप अपना नंबर भी लाइए।
महाप्रभु की अहेतुकी कृपा बरस रही है, इसमें गोता तो लगाइए ये अवसर फिर नही मिलेगा, इसे चूक मत जाइए।
