चहल-पहल सी दिखती है, इत देखूं कि उत देखूं, पर कोई नहीं समझता है जीवन का क्या है हेतु।
चमक धमक से आकर्षित है , नयन सभी के कजरारे, पर भूल कर बैठे हैं लोग की कैद में है ,हम सारे।
उथल-पुथल सी चल रही, चाहे देश हो या विदेश हो , फिर भी पालन नहीं करते शास्त्रों के निर्देश को ।
अदल बदल के देख रहे वस्तुएं भी और रिश्ते भी, बाहरी सजावट खोखली है, झाकों अब थोड़ा भीतर भी।
शान शौकत अमीरों सी बनाने में सब लग पड़े, पर शतरंज के सभी मोहरे अंत में साथ डिब्बे में पड़े ।
हंसते खेलते, नाचते गाते,लोग हमें दिखाते हैं सभी, पर अकेले में उनके बहते आंसू महसूस किए हैं तुमने कभी?
अंदर बाहर सब भटक रहे, कभी यह शरीर कभी वह शरीर, पूर्ण विराम लगाकर के, अब अपने स्वरूप में हो जाओ स्थिर।
उठो जागो अब बंद करो गर्भ चक्र में आना जाना, नित्य दास के रूप में अब भगवान की सेवा में है लग जाना ।
कृष्ण ही कृष्ण दिखे अब तो, इत देखूं कि उत देखूं, एकमात्र प्रेममई सेवा , हमारे जीवन का हो हेतू।
