मुझे भी चाहिए नीला खुला आसमान, मैं भी भरना चाहती हूँ ऊँची उड़ान।
बहुत झेले हैं अलग-अलग शरीरों के बंधन, अब खुद से कराना चाहती हूँ अपनी पहचान।
ज़रूर फर्क है अमीरों के महल और गरीबों की झोपड़ी में, पर अंत में तो मिलता है सभी को श्मशान एक समान।
भाग रहा है हर कोई सुख पाने के लिए, पर दुख भी अचानक दस्तक देता है, जैसे कोई अनजान मेहमान।
आजमा कर देख लिया इस जगत को कई जन्मों से, अब परम धाम में जाने के जागे हैं मेरे भी अरमान।
साधु-संतों से सुनी है भगवान की महिमा और करुणा, बढ़ रहा है अब मेरे मन में भी उनके प्रति सम्मान।
तैयार हो रही हूँ मैं त्यागने को अपनी झूठी स्वतंत्रता, आपका आश्रय ही तो है वास्तव में मेरी आज़ादी का फरमान।
मुझे भी चाहिए नीला खुला आसमान, मैं भी भरना चाहती हूँ ऊँची उड़ान।
