भगवद्गीता अध्याय 2 में “स्थितप्रज्ञ” शब्द आता है। अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति कैसा होता है, वह कैसे बोलता, चलता और व्यवहार करता है।
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव । स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥
इसका अर्थ है — “हे केशव! जिसकी बुद्धि स्थिर हो गई है, जो भगवान में स्थित है, वह व्यक्ति कैसा होता है?”
प्रभुपाद ने अपने तात्पर्य में स्पष्ट बताया है कि स्थितप्रज्ञ वह अवस्था है जब मनुष्य अपनी इन्द्रियों को उन विषयों से हटाना सीख जाता है जो उसे भगवान से दूर ले जाते हैं। भगवद्गीता में कछुए का उदाहरण दिया गया है कि जैसे कछुआ खतरा देखकर अपने अंगों को अंदर कर लेता है, वैसे ही भक्त अपनी इन्द्रियों को नियंत्रित करना सीखता है।
इसका मतलब यह नहीं कि हम कुछ देखें, सुनें या करें ही नहीं, बल्कि अपनी इन्द्रियों को भगवान की सेवा में लगाना ही स्थितप्रज्ञता है। जैसे कान भगवान की कथा सुनें, जीभ भगवान का नाम ले और आँखें भगवान के दर्शन करें। जब हमारा मन संसार के आकर्षणों से हटकर भगवान की भक्ति में स्थिर होने लगे, तब धीरे-धीरे मनुष्य स्थितप्रज्ञ अवस्था की ओर बढ़ता है।
