Srila Prabhupada:The Compassionate Pied Piper of Krishna
हम सब जानते हैं ,1960 के दशक के मध्य में, पश्चिमी दुनिया (Western world) एक गहरे मानसिक और आध्यात्मिक संकट से गुजर रही थी। वहां के लाखों युवा भौतिकवाद से परेशान होकर आनंद की तलाश में भटक रहे थे। इस उथल-पुथल के बीच, 70 साल के एक भारतीय संन्यासी, हिस डिवाइन ग्रेस ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद न्यूयॉर्क के तट पर उतरे। उन्हें मैंने प्रेम से कृष्ण का "पाइड पाइपर" (Pied Piper) नाम दिया है, लेकिन उनकी कथा उस लोककथा के पाइड पाइपर से बिल्कुल अलग और दिव्य थी।
स्वार्थ बनाम निस्वार्थ भाव (Selfishness vs. Selflessness)पुरानी लोककथा का पाइड पाइपर एक सौदागर था। उसने राजा से पैसे (पुरस्कार) के बदले में शहर के सभी चूहों को हटाने का वादा किया था। उसने अपनी बांसुरी बजाई, चूहों को आकर्षित किया और उन्हें नदी में डुबोकर एक तरह से नष्ट कर दिया। उसका उद्देश्य केवल अपना स्वार्थ और धन कमाना था।इसके विपरीत, श्रील प्रभुपाद का कोई निजी स्वार्थ नहीं था। उनके हृदय में गुरु के आदेश और हरिनाम संकीर्त आंदोलन के प्रति दृढ़ श्रद्धा और विश्वास था।वह किसी धन या प्रसिद्धि के लिए सात समंदर पार नहीं गए थे,गुरु और कृष्ण की प्रसन्नता के लिए ,सभी जीवों को कृष्णभावनामृत का उपहार देने गए थे । वह पूरी तरह से निस्वार्थ भाव से वहां गए थे।
लोककथा के पाइड पाइपर ने चूहों को नदी में डुबोकर मार दिया, लेकिन प्रभुपाद ने समाज द्वारा दुत्कारे गए उन युवाओं पर करुणा दिखा, उनके भीतर के विकारों को नष्ट करके उन्हें एक नया आध्यात्मिक जीवन दान दिया।
टॉम स्किन पार्क में बैठकर घंटों प्रभुपाद का हरे कृष्ण महामंत्र का कीर्तन करना धीरे-धीरे सभी युवाओं के हृदय को स्पर्श करता चलता गया और वे सब जुड़ते चले गए।
"वहाँ बांसुरी की धुन विनाश का निमंत्रण थी; यहाँ महामंत्र की ध्वनि शाश्वत जीवन का आह्वान बन गई।"
समदर्शी और करुणामयी हृदय (The Equal Vision and Compassion)
जब प्रभुपाद अमेरिका पहुंचे, तो वहां के युवाओं की स्थिति दयनीय थी। वे नशे में धुत पड़े रहते थे, स्वच्छता का कोई नामोनिशान नहीं था, और वे बिना नियम-कानून के अनियंत्रित जीवन जी रहे थे। कोई भी आम व्यक्ति उन्हें देखकर घृणा कर सकता था और सोच सकता था कि "ये कैसे लोग हैं? कोई स्वच्छता नहीं, स्त्रियों के साथ ऐसा अनुचित संग, ऐसे लोगों की परवाह कौन करेगा?"लेकिन श्रील प्रभुपाद 'समदर्शी' थे। उन्होंने किसी से घृणा नहीं की। उन्होंने उनके बाहरी शरीर, उनके नशे या उनकी गंदगी को नहीं देखा; बल्कि उन्होंने उन सबमें कृष्ण के अंश को देखा। उन्होंने देखा कि ये सभी दिव्य आत्माएं हैं, जो अपने परमपिता भगवान से बिछड़कर इस भौतिक संसार में भटक रही हैं। उनके हृदय में असीम करुणा और मैत्री भाव था। वे उनके वास्तविक हितैषी थे,जो उनके साथ हुए इस वियोग को समाप्त कर उन्हें वापस भगवान से जोड़ना चाहते थे।
वास्तविक आनंद और हरिनाम का नशा (The Search for True Happiness)
वे युवा नशे में इसलिए डूबे थे क्योंकि वे असल में 'आनंद' की तलाश कर रहे थे। भौतिक संसार में सच्चा आनंद न मिलने के कारण वे कृत्रिम नशे का सहारा ले रहे थे। प्रभुपाद ने उनकी इस तड़प को समझा। उन्होंने उन्हें 'हरे कृष्ण महामंत्र' के रूप में हरिनाम की वह दिव्य धुन दी, जिसने उन्हें वास्तविक आनंद का स्वाद चखाया। यह एक ऐसा दिव्य नशा था जो एक बार चढ़ जाए, तो फिर कभी उतरता ही नहीं । (The intoxication that never fades)। इस हरिनाम ने उनके जीवन के सारे कृत्रिम और विनाशकारी नशों को हमेशा के लिए छुड़ा दिया।
इस्कॉन की नाव और भवसागर से पार (The Boat of ISKCON) लोककथा के पाइड पाइपर ने चूहों को नदी में ले जाकर डुबो दिया था, लेकिन कृष्ण के इस करुणामयी पीड पाइपर ने इन भटकती हुई आत्माओं को डूबने से बचा लिया। श्रील प्रभुपाद ने उन्हें इस्कॉन (ISKCON) रूपी दिव्य नाव में बिठा दिया और इस भौतिक संसार के कष्टमयी भवसागर को पार करने का मार्ग दिखा दिया। उन्होंने इन जीवों का पूर्ण उद्धार कर दिया ।
परिणामस्वरूप- पिछले कई दशकों में) न जाने कितने अनगिनत लोग इस नाव पर सवार होकर भगवद-धाम (Back to Godhead) को प्राप्त कर चुके हैं। आज भी लाखों लोग इस नाव के सहारे भवसागर पार कर रहे हैं, और आने वाले समय में भी जो कोई इस प्रामाणिक भक्ति-प्रक्रिया का पालन करेगा, वह इसी तरह भगवद-धाम को प्राप्त करता रहेगा।
निष्कर्ष :- श्रील प्रभुपाद कोई साधारण गुरु या नेता नहीं थे; वे मानवता के इतिहास के सबसे बड़े रक्षक थे।
" जहाँ दुनिया का पाईड पाइपर विनाश का प्रतीक था, वहीं प्रभुपाद परम कल्याण और आत्मीय पुनरुद्धार के प्रतीक बने।"
उनके द्वारा शुरू की गई हरिनाम की यह दिव्य धुन आज भी गूंज रही है, जो हर सोई हुई आत्मा को जगाकर उसे अपने असली घर, भगवान के चरणों में वापस ले जा रही है।
इस दिव्य गाथा को शब्दों में पिरोते हुए, मेरे हृदय में भी तीव्र इच्छा जागृत होती है कि मैं भी कृष्ण के इस 'करुणामयी पाइड पाइपर' (श्रील प्रभुपाद) की सेना में एक छोटी सी सैनिक बनकर उनके पीछे पीछे चल सकूँ।
हे श्रील प्रभुपाद! आपके चरणों में मेरी यही विनती है कि मुझे भी 'हरे कृष्ण महामंत्र' की उस दिव्य ध्वनि का वह रस, वह असीम आनंद प्राप्त हो, जिससे मेरा हृदय पूरी तरह शुद्ध हो जाए। जब मेरा हृदय उस रस से भर जाएगा, तभी मैं उस आनंद को बिना किसी स्वार्थ के अन्यों में बांट सकूंगी। मुझे अपना आशीर्वाद और शक्ति दीजिए ताकि मैं आपके इस दिव्य संकीर्तन आंदोलन की एक निष्कपट सेविका बन सकूं और इस भवसागर में डूबते हुए लोगों को इस्कॉन की नाव तक पहुंचाने में गिलहरी की भांति ही सही, पर अपना छोटा सा योगदान दे सकूं।
क्या आप भी इस क्रांतिकारी आंदोलन में जुड़ना चाहेंगे?
हरे कृष्ण !
