हरे कृष्णा कल मैने चलते फिरते एफएम पर सुना 'सुनो सुनाओ लाइफ बनाओ' तो मैं सोचने लगी कि कितना सही है सुनने से ही लाइफ बनती है पर क्या सुने यह बहुत महत्वपूर्ण है| हमारे पास बहुत विकल्प है शास्त्रों को सुने या माया को चुने| शास्त्र श्रवण इस जीवन की ही नहीं शाश्वत लाइफ बनाएगा और भौतिकतावादी श्रवण इस शाश्वत जीवन से ही दूर ले जाएगा| श्रील प्रभुपाद कहते हैं की एक साधु का दर्शन आंखों से नहीं कानों से करना चाहिए जो हम सुनते हैं वही हमारे हृदय में उतरता है और हमारी मन की स्थिति को दर्शाता है| प्रहलाद महाराज ने भी नवधा भक्ति बतलाई है जिसका पहला अंग श्रवण ही है अर्थात भक्ति की शुरुआत श्रवण से ही होती है| स्वयं प्रहलाद महाराज ने जब वह अपनी मां के गर्भ में थे उन्होंने नारद मुनि से ज्ञान लिया| असुर परिवार में होने के पश्चात भी उन्होंने जो कुछ सुना था उससे भक्ति का सूत्रपात हुआ| श्रवण इतना शक्तिशाली है कि बिना योग्यता के भी जीव को शुद्ध कर देता है जिस प्रकार दवाई मरीज की योग्यता को देखकर नहीं दी जाती दवाई खाने से ही दर्द दूर हो जाता है इस प्रकार श्रवण हमारे सोई हुई कृष्णा भावना भावित चेतना का उदय करता है| जब हम गुरु से आचार्य से श्रवण करते हैं तो हमारी सोई हुई चेतना कार्य करने लगती हैं| हमारा मन जो माया की ओर भाग रहा था वह खींच लिया जाता है| हम देख सकते हैं की परीक्षित महाराज जो पांडवों के पौत्र थे उन्होंने अपने अंतिम समय में श्रवण को चुना और जीवन के वास्तविक सिद्धि प्राप्त की| श्रवण कृष्ण की कृपा को आकर्षित करता है भगवान स्वयं बाध्य हो जाते हैं कृपा करने के लिए| वह हमारी श्रद्धा का निरीक्षण करते हैं और श्रद्धा का प्रारंभ भी श्रवण से ही होता है| श्रद्धा मजबूत भी श्रवण से ही होती है| रुक्मिणी देवी को मात्र कृष्ण के विषय में श्रवण करने से प्रेम हो गया था|श्रवण का एक शब्द भी भौतिकता को नष्ट कर सकता है| शुकदेव गोस्वामी ब्रह्मवादी थे उन्होंने जब कृष्ण की महिमा को सुना तो वह भक्त बन गए| यही श्रवण की महिमा है|कृष्ण का श्रवण हृदय के मालीनता को दूर कर देता है भक्ति के नौ अंगों में प्रधान श्रवण ही है| बाकी के आठ अंग भी श्रवण पर ही आधारित है| श्रवण मां की तरह है और कीर्तन बच्चों की तरह है तीसरा स्मरण है श्रील प्रभुपाद कहते हैं कि जब श्रवण और कीर्तन अच्छा होगा तभी स्मरण अच्छा होगा| श्रवण बीज है तो स्मरण फल है | चौथा अंग पादसेवनाम है जब तक गुरु साधु शास्त्रों से सुनेंगे नहीं तब तक पाद सेवन कैसे कर पाएंगे सेवा के लिए जो हृदय चाहिए वह श्रवनम से ही आता है| पांचवा अंग अर्चना है सुनने के बाद ही भगवान की अर्चना हम श्रद्धापूर्वक कर सकते हैं| प्रार्थनाएं करने के लिए जो भाव चाहिए वह भी श्रवण से ही आता है अर्थात वंदनम| यदि श्रद्धा का बीज अंकुरित होगा तभी प्रार्थनाएं मन से निकलेंगी और हम आचार्य की प्रार्थनाओं को दोहरा सकेंगे| दास्य का अर्थ भी कृष्ण को समर्पित करना है| दासय तभी होगा जब शरणागति होगी और शरणागति का भाव तभी आता है जब हम कृष्ण कथा को सुनते हैं| हृदय की मालीनता दूर हो जाती है| कृष्ण के विषय में सुनने के लिए जो निकटता चाहिए वह भी कृष्ण के श्रवण से ही आएगी| आत्म निवेदन यह नवा अंग है स्वयं को पूर्ण रूप से दे देना|अटूट श्रद्धा और विश्वास का प्रमाण है श्रवण| यही सबसे सरल मार्ग है यदि हमें अपने हृदय में कृष्ण को लाना है तो तैयारी करनी होगी|कृष्ण के विषय में सुनना होगा इसलिए सुनो सुनाओ लाइफ बनाओ|
