International Society for Krishna Consciousness

Founder Acharya — HDG A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada

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भगवत प्राप्ति
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भगवत प्राप्ति

एक राजा था। वह बहुत न्यायप्रिय तथा प्रजावत्सल एवं धार्मिक स्वभाव का था। वह नित्य अपने इष्टदेव की बड़ी श्रद्धा से पूजा-पाठ किया करता था।

भाषा:

एक राजा था। वह बहुत न्यायप्रिय तथा प्रजावत्सल एवं धार्मिक स्वभाव का था। वह नित्य अपने इष्टदेव की बड़ी श्रद्धा से पूजा-पाठ किया करता था।

एक दिन इष्टदेव ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिए तथा कहा - “राजन्! मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ। बोलो, तुम्हारी कोई इच्छा है?”

प्रजा को चाहने वाला राजा बोला, “भगवन्! मेरे पास आपका दिया सब कुछ है। आपकी कृपा से राज्य में सब प्रकार की सुख-शान्ति है। फिर भी मेरी एक इच्छा है कि जैसे आपने मुझे दर्शन देकर धन्य किया, वैसे ही मेरी सारी प्रजा को भी दर्शन दीजिए।”

“यह तो सम्भव नहीं है।” भगवान ने राजा को समझाया।

परन्तु प्रजा को चाहने वाला राजा भगवान् से ज़िद करने लगा। आखिर भगवान को अपने साधक के सामने झुकना पड़ा और वे बोले—“ठीक है, कल अपनी सारी प्रजा को उस पहाड़ी के पास लाना। मैं पहाड़ी के ऊपर से दर्शन दूँगा।”

राजा अत्यन्त प्रसन्न हुआ और भगवान को धन्यवाद दिया।

अगले दिन सारे नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि कल सभी पहाड़ के नीचे मेरे साथ पहुँचें, वहाँ भगवान आप सबको दर्शन देंगे। दूसरे दिन राजा अपनी समस्त प्रजा और स्वजनों को साथ लेकर पहाड़ी की ओर चलने लगा। चलते-चलते रास्ते में एक स्थान पर ताँबे के सिक्कों का पहाड़ दिखा। प्रजा में से कुछ उस ओर भागने लगे।

तभी भक्त राजा ने सबको सतर्क किया कि कोई उस ओर ध्यान न दे, क्योंकि तुम सब भगवान से मिलने जा रहे हो। इन ताँबे के सिक्कों के पीछे अपने भाग्य को लात मत मारो।

परन्तु लोभ-लालच के वशीभूत कुछ प्रजा ताँबे के सिक्कों वाली पहाड़ी की ओर भाग गई और सिक्कों की गठरी बनाकर अपने घर की ओर चलने लगे। वे मन ही मन सोच रहे थे, पहले ये सिक्के समेट लें, भगवान से तो फिर कभी मिल लेंगे।

राजा खिन्न मन से आगे बढ़े।

कुछ दूर चलने पर चाँदी के सिक्कों का चमचमाता पहाड़ दिखाई दिया। इस बार भी बची हुई प्रजा में से कुछ लोग उस ओर भागने लगे और चाँदी के सिक्कों को गठरी बनाकर अपने घर की ओर चलने लगे। उनके मन में विचार चल रहा था कि ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलता है। चाँदी के इतने सारे सिक्के फिर मिले न मिले, भगवान तो फिर कभी मिल जाएँगे।

इसी प्रकार कुछ दूर और चलने पर सोने के सिक्कों का पहाड़ नज़र आया। अब तो प्रजाजनों में बचे हुए सारे लोग तथा राजा के स्वजन भी उस ओर भागने लगे। वे भी दूसरों की तरह सिक्कों की गठरी लादकर अपने-अपने घरों की ओर चल दिए। अब केवल राजा और रानी ही शेष रह गए थे।

राजा रानी से कहने लगे—“देखो, कितने लोभी हैं ये लोग, भगवान से मिलने का महत्त्व ही नहीं जानते हैं। भगवान के सामने सारी दुनिया की दौलत क्या चीज़ है?”

“सही बात है।” रानी ने राजा की बात का समर्थन किया और वे आगे बढ़ने लगे।

भगवत प्राप्ति

कुछ दूर चलने पर राजा और रानी ने देखा कि सप्तरंगी आभा बिखेरता हीरों का पहाड़ है। अब तो रानी से रहा नहीं गया। हीरों के आकर्षण से वह भी दौड़ पड़ी और हीरों की गठरी बनाने लगी। फिर भी उसका मन नहीं भरा तो साड़ी के पल्लू में भी बाँधने लगी। वजन के कारण रानी के वस्त्र देह से अलग हो गए, परन्तु हीरों की तृष्णा अभी भी नहीं मिटी।

यह देख राजा को अत्यन्त ग्लानि और विरक्ति हुई। बड़े दुःखी मन से राजा अकेले ही आगे बढ़ते गए।

पहाड़ पर सचमुच भगवान खड़े उसका इंतज़ार कर रहे थे। राजा को देखते ही भगवान मुस्कुराए और पूछा—“कहाँ है तुम्हारी प्रजा और तुम्हारे प्रियजन? मैं तो कब से उनसे मिलने के लिए बेकरारी से उनका इंतज़ार कर रहा हूँ।”

राजा ने शर्म और आत्मग्लानि से अपना सिर झुका लिया।

तब भगवान ने राजा को समझाया—“राजन्! जो लोग भौतिक सांसारिक प्राप्ति को मुझसे अधिक मानते हैं, उन्हें कदाचित मेरी प्राप्ति नहीं होती और वे मेरे स्नेह तथा आशीर्वाद से भी वंचित रह जाते हैं।”

भगवत प्राप्ति

भगवद्गीता २.४४ में भी कहा गया है -

“भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्। व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥”

अर्थ: जो लोग भोग और ऐश्वर्य में अत्यधिक आसक्त होते हैं और जिनका चित्त उनसे मोहित हो जाता है, उनकी भगवान में स्थिर होने वाली एकनिष्ठ बुद्धि उत्पन्न नहीं होती।

शिक्षा: भौतिक सुख, धन और ऐश्वर्य के प्रति अत्यधिक आसक्ति व्यक्ति के मन को विचलित कर देती है, जिससे वह भगवान की प्राप्ति के लक्ष्य पर दृढ़ता से स्थिर नहीं रह पाता।
हरे कृष्ण
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