एक समय एक गरीब ब्राह्मण रहता था जिसका नाम वासुदेव था। वह अपने मित्र के घर उससे ऋण माँगने गया। उसके मित्र ने कहा कि उसके पास देने के लिए धन नहीं है और उसने वासुदेव से कहा कि नगर का राजा सुबह जिस पहले ब्राह्मण से मिलेगा, उसे दो स्वर्ण मुद्राएँ देगा। तब वासुदेव ने कहा कि वह रात वहीं बिताएगा और भोर से पहले महल चला जाएगा। उस रात उसे बिल्कुल नींद नहीं आई क्योंकि वह सोचता रहा कि यदि वह देर से उठ गया तो कोई दूसरा ब्राह्मण जाकर राजा से वे दो स्वर्ण मुद्राएँ ले सकता है। इसलिए उसने निश्चय किया कि वह तुरंत महल चला जाए ताकि वह निश्चित कर सके कि राजा से मिलने वाला पहला ब्राह्मण वही हो।
महल के बाहर खड़े पहरेदारों ने उसे जासूस समझ लिया और उसे जेल में डाल दिया। अगले दिन सैनिक वासुदेव को राजा के सामने ले आए और राजा से कहा कि वासुदेव एक जासूस है। वासुदेव ने राजा से कहा कि वह जासूस नहीं है और द्वार पर इसलिए प्रतीक्षा कर रहा था कि वह दो स्वर्ण मुद्राएँ पाने वाला पहला व्यक्ति बन सके। राजा ने उससे कहा क वासुदेव को जो कुछ भी चाहिए, वह देगा। वासुदेव ने राजा से कहा कि उसे यह निर्णय करने के लिए कुछ समय चाहिए।

उसने निश्चय किया कि वह बीस स्वर्ण मुद्राएँ माँगेगा और फिर उसने सोचा कि शायद वह इसे दो हजार कर सकता है। फिर उसने सोचा कि राजा निश्चित रूप से और अधिक देने में समर्थ होगा। इसलिए उसने इसे दो करोड़ करने का निश्चय किया। तभी उसने देखा कि एक संन्यासी अपने शिष्यों को यह शिक्षा दे रहा था, “सभी इच्छाएँ पीड़ा लाती हैं।” यह सुनकर वासुदेव को समझ में आया कि वह केवल धन की इच्छा के कारण ही इन सभी परेशानियों में पड़ा था। पहले वह केवल दो मुद्राएँ चाहता था, पर अब दो करोड़ भी उसे बहुत कम लग रहे थे। इसलिए वह वापस राजा के पास गया और राजा से कहा कि उसे कुछ नहीं चाहिए, क्योंकि उसे समझ में आ गया था कि धन उसे और अधिक दुःख देगा और वही सबसे अधिक सुखी है जो कुछ नहीं चाहता। (सन्तुष्टः) उसने राजा को आशीर्वाद दिया और वहाँ से चला गया।

यह कहानी हमें श्रीमद्भागवत 11.8.44 के इस उद्धरण की याद दिलाती है:
आशा हि परमं दुःखं नैराश्यं परमं सुखम्।
अर्थ: भौतिक इच्छा निस्संदेह सबसे बड़े दुःख का कारण है, और ऐसी इच्छा से मुक्त होना सबसे बड़े सुख का कारण है। इसलिए इस कहानी में ब्राह्मण यह समझ गया कि इस धन के लिए उसे रातों की नींद गंवानी पड़ी और जेल में भी डाला गया (दुःख-संचितम्), परन्तु उसमें उसे कोई सुख देने की शक्ति नहीं थी। जबकि
ब्रह्म-भूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
अर्थ: जो आध्यात्मिक रूप से स्थित है, वह सदैव प्रसन्न रहता है और न शोक करता है और न किसी वस्तु को पाने की इच्छा करता है।
शिक्षा: भौतिक सुख नाशवान है, और इस जगत से जुड़ी आशाएँ हमेशा दुःख देती हैं। जो नैराश्य को अपनाकर भगवद्-भक्ति में लगा है, वही वास्तव में संतुष्ट और सुखी है।
