एक बार हस्तिनापुर में कौरवों और पांडवों की शिक्षा पूरी होने के बाद, गुरु द्रोणाचार्य अपने दो सबसे प्रमुख शिष्यों—युधिष्ठिर (जो धर्मराज के रूप में जाने जाते थे) और दुर्योधन (जो अहंकार और ईर्ष्या के प्रतीक थे)—की मानसिक और आध्यात्मिक चेतना की परीक्षा लेना चाहते थे। गुरुदेव ने दोनों को अपने पास बुलाया और उन्हें एक-एक विशेष कार्य सौंपा। दुर्योधन का कार्य: "संसार का सबसे अच्छा इंसान ढूंढो" गुरु द्रोणाचार्य ने दुर्योधन से कहा, "दुर्योधन, तुम समाज में जाओ, चारों दिशाओं में घूमो और इस संसार में से किसी एक सबसे अच्छे, गुणी और श्रेष्ठ व्यक्ति को खोजकर मेरे सामने लेकर आओ।" दुर्योधन ने अहंकार से सिर हिलाया और अपने रथ पर सवार होकर निकल पड़ा। उसने नगरों, गांवों, महलों और आश्रमों का दौरा किया। वह हर किसी से मिलता, उनके व्यवहार को देखता, लेकिन उसे हर व्यक्ति में कोई न कोई कमी, लालच, झूठ या खोट दिखाई दे जाता। काफी समय भटकने के बाद, दुर्योधन खाली हाथ गुरु द्रोणाचार्य के पास वापस लौटा। गुरुदेव ने पूछा, "क्या तुम्हें कोई अच्छा व्यक्ति मिला, दुर्योधन?" दुर्योधन ने गर्व से उत्तर दिया, "गुरुदेव! मैंने पूरी दुनिया छान मारी। साधु-संतों से लेकर राजा-महाराजाओं तक को देखा। लेकिन मुझे हर किसी में कोई न कोई बुराई या कमजोरी जरूर दिखाई दी। सच कहूँ तो, इस पूरे संसार में मुझे अपने से अच्छा, बुद्धिमान और श्रेष्ठ कोई दूसरा मिला ही नहीं! इसलिए मैं किसी को नहीं ला सका।" युधिष्ठिर का कार्य: "संसार का सबसे बुरा इंसान ढूंढो" इसके बाद गुरु द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर को बुलाया और कहा, "युधिष्ठिर, अब तुम्हारा कार्य इसके विपरीत है। तुम जाओ और इस संसार में से किसी एक सबसे बुरे, पापी या अधर्मी व्यक्ति को खोजकर मेरे पास लाओ।" युधिष्ठिर ने गुरु की आज्ञा शिरोधार्य की और वे भी संसार के भ्रमण पर निकल पड़े। युधिष्ठिर समाज के सबसे निचले तबके से लेकर अपराधियों और क्रूर लोगों से भी मिले। लेकिन जब भी वे किसी डाकू या पापी को देखते, तो सोचते—"इसने यह अपराध शायद भूख के कारण या किसी मजबूरी में किया होगा, इसके भीतर की आत्मा तो शुद्ध है।" वे हर व्यक्ति के भीतर छिपी अच्छाई, दया या मजबूरी को देख लेते थे। घूमते-घूमते बहुत दिन बीत गए। अंत में युधिष्ठिर भी अकेले और खाली हाथ गुरुदेव के सामने आकर खड़े हो गए। उनका सिर झुका हुआ था। गुरुदेव ने पूछा, "युधिष्ठिर! क्या तुम्हें संसार का सबसे बुरा व्यक्ति नहीं मिला?" युधिष्ठिर ने अत्यंत विनम्रता से कहा, "क्षमा करें गुरुदेव! मैं असफल रहा। जब मैंने दूसरों को देखा, तो मुझे उनके भीतर कोई न कोई अच्छाई जरूर नजर आई। लेकिन जब मैंने निष्पक्ष होकर अपने भीतर झांका, तो मुझे अपने अंदर काम, क्रोध, मोह, और अनगिनत कमियां दिखाई दीं। मुझे समझ आया कि इस संसार में मुझसे बुरा और कमियों से भरा हुआ कोई दूसरा व्यक्ति है ही नहीं। मैं किसी और को बुरा कैसे कह सकता हूँ?"
इस कहानी की गहरी सीख
गुरु द्रोणाचार्य मुस्कुराए और उन्होंने पूरी सभा को समझाया कि दोनों शिष्य एक ही समाज में गए थे, लेकिन दोनों का निष्कर्ष बिल्कुल अलग था। इसका कारण उनका दृष्टिकोण (Vision) था। • दुर्योधन की चेतना (दोष-दर्शी): दुर्योधन के भीतर अहंकार, ईर्ष्या और मलिनता थी। इसलिए उसे पूरी दुनिया में केवल दोष, बुराइयां और कमियां ही दिखाई दीं। उसे लगा कि वह खुद ही सबसे श्रेष्ठ है। इसे मक्खी जैसी चेतना कहा जाता है, जो पूरे सुंदर शरीर को छोड़कर केवल घाव या गंदगी पर बैठती है। • युधिष्ठिर की चेतना (गुण-ग्राही): युधिष्ठिर का हृदय पवित्र, विनम्र और कृष्ण-भक्ति में लीन था। वे स्वयं अंदर से शुद्ध थे, इसलिए उन्हें हर जीव में भगवान का अंश और कोई न कोई अच्छाई दिखाई दी। वे स्वयं को सबका सेवक और सबसे अदना मानते थे। इसे मधुमक्खी जैसी चेतना कहा जाता है, जो केवल फूलों से रस ढूंढती है।
