International Society for Krishna Consciousness

Founder Acharya — HDG A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada

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रेत के महल और काल की लहर
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रेत के महल और काल की लहर

एक दिन कुछ माता-पिता अपने छोटे बच्चों को छुट्टी के दिन समुद्र के किनारे (Beach) घुमाने ले गए।

भाषा:

एक दिन कुछ माता-पिता अपने छोटे बच्चों को छुट्टी के दिन समुद्र के किनारे (Beach) घुमाने ले गए। समुद्र तट पर पहुँचते ही बच्चे बहुत प्रसन्न हो गए। वे तुरंत गीली रेत पर बैठ गए और खेल-खेल में अपने छोटे-छोटे हाथों से रेत के सुंदर घर और महल (Sandcastles) बनाने लगे। कोई बच्चा अपनी रेत की हवेली पर सीपियों की खिड़कियां सजा रहा था, तो कोई सूखी लकड़ियों से दरवाजा और झंडा बना रहा था। बच्चे उस खेल में इतने खो गए कि उन्हें लगा कि वे सचमुच के बहुत बड़े राजा और स्वामी बन गए हैं। वे एक-दूसरे से कहने लगे, "देखो, यह मेरा घर है, वह तुम्हारा घर है। खबरदार जो किसी ने मेरे महल की दीवार को छुआ!" वे उस रेत की ढेरी को ही अपना असली साम्राज्य मानने लगे। समय बीतता गया। शाम ढलने लगी और सूरज समुद्र की गोद में समाने लगा। अंधेरा बढ़ता देख माता-पिता ने बच्चों को आवाज लगाई, "बच्चों! खेल खत्म हुआ, अब बहुत देर हो गई है। सामान समेटो, हमें अपने असली घर वापस लौटना है।" यह सुनकर बच्चे ज़िद करने लगे और रोनी सूरत बनाकर बोले, "नहीं-नहीं! हम कहीं नहीं जाएंगे! हमारे सुंदर घर तो यहाँ बन चुके हैं। हम तो यहीं रहेंगे, यह हमारा घर है!" वे अपने उस रेत के घरों को छोड़ने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे। माता-पिता बच्चों की इस नासमझी पर केवल मुस्कुरा रहे थे। तभी अचानक समुद्र से पानी की एक बहुत बड़ी, शक्तिशाली लहर उठी और सीधे तट पर आ पहुंची। पलक झपकते ही, वह लहर सारे रेत के महलों को बहाकर ले गई। जहाँ कुछ क्षण पहले सुंदर दीवारें और मीनारें थीं, वहाँ केवल सपाट गीली रेत बची थी—उन महलों का कोई नामोनिशान तक नहीं रहा। यह देखकर बच्चे ज़ोर-ज़ोर से रोने और विलाप करने लगे, "हाय! हमारा घर टूट गया! हमारा महल बर्बाद हो गया!" माता-पिता ने मुस्कुराते हुए बच्चों को उठाया, उनका हाथ पकड़ा और प्यार से कहा, "अरे पगलो, रोते क्यों हो? वह तो केवल रेत के खिलौने थे। वे कभी टिकने वाले नहीं थे। तुम्हारा असली और पक्का घर तो शहर में है, चलो वहाँ चलते हैं।"

कहानी का आध्यात्मिक संदेश और विश्लेषण

श्रील प्रभुपाद समझाते थे कि इस भौतिक संसार में हम बड़ों की स्थिति भी ठीक उन नादान बच्चों जैसी ही है: १.हमारे कंक्रीट के घर भी केवल "रेत के महल" हैं: हम जीवन भर खून-पसीना बहाकर बड़ी-बड़ी हवेलियाँ, फ्लैट, बैंक बैलेंस और प्रतिष्ठा का साम्राज्य खड़ा करते हैं। लेकिन हम भूल जाते हैं कि यह सब केवल भौतिक तत्वों (मिट्टी, पानी, हवा) से बना है। जब भूकंप, बाढ़, महामारी या समय की मार पड़ती है, तो ये आलीशान महल भी रेत की तरह ढह जाते हैं। २.काल की लहर (The Tide of Time / Death): समुद्र की वह शक्तिशाली लहर "काल यानी मृत्यु" का प्रतीक है। हम चाहे अपने परिवार और संपत्ति को कितना भी मजबूत सुरक्षा घेरा क्यों न दे दें, जब काल रूपी लहर आती है, तो वह हमारे पद, शरीर, बैंक बैलेंस और घर को एक झटके में बहा ले जाती है। ३.हमारा रोना और विलाप (False Attachment): जब हमारी भौतिक योजनाएं ध्वस्त होती हैं या कोई प्रियजन छूटता है, तो हम उन बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोते हैं। भगवान और प्रबुद्ध संत (माता-पिता के समान) हमारी इस दशा को देखकर यही सोचते हैं कि "यह सब तो नश्वर (Temporary) था, तुम जानते थे कि यह एक दिन छूटना ही है, फिर इस रेत की ढेरी से इतनी आसक्ति क्यों लगाई?" ४.हमारा असली घर (The Real Home): बच्चे भूल गए थे कि समुद्र का किनारा केवल कुछ देर के खेल के लिए था, उनका असली घर कहीं और था। उसी तरह, हम आत्माएं यह भूल चुकी हैं कि यह भौतिक जगत हमारा घर नहीं है। यह केवल एक अस्थायी पड़ाव है। हमारा वास्तविक, शाश्वत और कभी न नष्ट होने वाला घर "भगवद्धाम" (वैकुंठ / गोलोक) है, जहाँ न तो काल की कोई लहर है और न ही जन्म-मृत्यु का चक्र।

संसार में अपने कर्तव्यों को निभाइए, लेकिन यह कभी मत भूलिए कि यहाँ सब कुछ रेत के घरौंदों जैसा है। जिस प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति समुद्र किनारे रेत का घर बनाकर भी जानता है कि शाम को लौटना है, उसी प्रकार हमें भी अनासक्त भाव से जीते हुए अपनी चेतना को हमेशा अपने मूल घर (भगवान के चरणों) की ओर मोड़कर रखना चाहिए।
हरे कृष्ण
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