एक महिला मृत्युशय्या पर लेटी हुई थीं और उनका बेटा उनके पास बैठा था। जब वे शरीर छोड़ने वाली थीं, तब उनके बेटे ने सोचा—क्यों न मैं उनके लिए कुछ अच्छा, कुछ आध्यात्मिक करूँ। वह स्थानीय इस्कॉन चेन्नई मंदिर गया और वहाँ के विग्रहों (Deities) की एक तस्वीर खरीदने के लिए गिफ्ट शॉप में गया। उसका विचार था कि वह तस्वीर अपनी माँ के सामने लगा दे, ताकि जब वे शरीर त्यागें, तो भगवान के सुंदर स्वरूप का दर्शन कर सकें।
उसने पूरी गिफ्ट शॉप छान मारी, पर आश्चर्य की बात यह थी कि उसे स्थानीय मंदिर की एक भी तस्वीर नहीं मिली। यह बहुत रहस्यमय था, क्योंकि सामान्यतः वहाँ हमेशा तस्वीरें रहती थीं, लेकिन उस दिन जब वह लड़का आया, तब एक भी उपलब्ध नहीं थी। फिर मंदिर के अध्यक्ष (Temple President) को बुलाया गया। जब उन्होंने पूरी परिस्थिति सुनी, तो वे उस लड़के को अपने घर ले गए। उन्होंने भी पूरे घर में खोज की, पर आश्चर्यजनक रूप से उनके पास भी स्थानीय मंदिर की एक भी तस्वीर नहीं थी—न गिफ्ट शॉप में, न मंदिर अध्यक्ष के पास।
अंत में जब कहीं भी तस्वीर नहीं मिली, तो मंदिर अध्यक्ष ने उस लड़के को एक दूसरी तस्वीर दी। वह तस्वीर इस्कॉन वृंदावन मंदिर के श्री श्री राधा श्यामसुंदर की थी। मंदिर अध्यक्ष ने कहा, “मेरे प्रिय पुत्र, ये राधा श्यामसुंदर चेन्नई मंदिर के विग्रहों से भिन्न नहीं हैं। ये पूर्णतः वही राधा-कृष्ण हैं। मेरे पास चेन्नई के विग्रहों की तस्वीर नहीं है, पर वृंदावन के राधा श्यामसुंदर की तस्वीर है। यदि तुम चाहो तो इसे अपनी माँ के सामने लगा दो, ताकि वे राधा श्यामसुंदर का दर्शन करते हुए अपना अंतिम श्वास लें।” लड़का सहमत हो गया और उसकी माँ ने राधा श्यामसुंदर का दर्शन करते हुए शरीर त्याग दिया।
अब आती है इस कथा की सबसे सुंदर मोड़!
महिला के शरीर त्यागने के बाद, भारतीय परंपरा के अनुसार तेरहवीं का कार्यक्रम रखा गया, जिसमें स्थानीय चेन्नई के भक्तों को भी आमंत्रित किया गया। जब ब्रह्मचारी भक्त वापस जा रहे थे, तब उनकी उस महिला के बेटे से बातचीत हुई। उस बेटे ने एक अत्यंत आश्चर्यजनक बात बताई। उसने कहा, “मेरी माँ ने श्रील प्रभुपाद से भेंट की थी।”
उस समय श्रील प्रभुपाद घोषणा कर रहे थे कि चेन्नई मंदिर का निर्माण हो रहा है, इसलिए यदि कोई मंदिर के लिए कुछ दान दे सके, तो वे अत्यंत कृतज्ञ होंगे। यह महिला एक समृद्ध परिवार से थीं। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद वे श्रील प्रभुपाद के पास गईं और ₹10,000 का चेक लिखकर उन्हें दे दिया। श्रील प्रभुपाद बहुत प्रसन्न हुए और बोले, “तुमने मुझे ₹10,000 दिए हैं, मैं तुम्हारा अत्यंत ऋणी हूँ। मैं वचन देता हूँ कि यह धन भगवान की सेवा में उपयोग होगा।”
यह सुनकर ब्रह्मचारी भक्तों ने पुराने अभिलेख (records) खोजने शुरू किए। श्रील प्रभुपाद प्रत्येक दान का रिकॉर्ड रखते थे, इसलिए उन्हें विश्वास था कि ₹10,000 की रसीद अवश्य मिलेगी। जब उन्होंने लगभग 50 वर्ष पुराने रिकॉर्ड देखे, तो उन्हें उस महिला का नाम मिला और उसके साथ श्रील प्रभुपाद के हस्ताक्षर भी थे। नीचे श्रील प्रभुपाद ने यह भी लिखा था कि उस धन का उपयोग किस कार्य में किया जाएगा—
“मैं इस ₹10,000 का उपयोग वृंदावन में कृष्ण-बलराम मंदिर के निर्माण के लिए कर रहा हूँ।”
वह महिला, जिसने केवल एक बार श्रील प्रभुपाद से भेंट की थी और केवल एक बार ₹10,000 का दान दिया था, उसी धन से वृंदावन के कृष्ण-बलराम मंदिर के निर्माण में योगदान हुआ।
“भले ही वह भूल गईं, पर भगवान नहीं भूले!”
भगवान ने उनकी उस सेवा को स्मरण रखा। इसलिए जब वे इस संसार से विदा हो रही थीं, तब उनके सामने कोई अन्य विग्रह नहीं आए, बल्कि वही श्री श्री राधा श्यामसुंदर, जिनकी सेवा के लिए उन्होंने 50 वर्ष पहले दान दिया था, उनके सम्मुख प्रकट हुए और वे उनका दर्शन करते हुए इस संसार से विदा हुईं।

यह अत्यंत आश्चर्य की बात है कि संसार के किसी भी विग्रह की तस्वीर उनके सामने आ सकती थी, परंतु उनके सामने वही राधा श्यामसुंदर आए, क्योंकि उन्होंने वर्षों पहले उनकी सेवा में थोड़ी-सी सेवा अर्पित की थी।
भगवान श्रीकृष्ण भगवद्गीता ४.११ में कहते हैं -
“ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।”
अर्थ: जैसे-जैसे लोग मेरी शरण ग्रहण करते हैं, मैं भी उसी प्रकार उन्हें प्रतिफल देता हूँ।”
शिक्षा: इस प्रकार भगवान बार-बार यह सिद्ध करते हैं कि वे अपने भक्तों के प्रेम और सेवा का प्रतिउत्तर अवश्य देते हैं। हम भगवान की सेवा में जो भी छोटा-सा प्रयास करते हैं, चाहे हम उसे भूल जाएँ, राधा-कृष्ण उसे कभी नहीं भूलते।