(बदलाव की कहानी)
अंगुलिमाल एक क्रूर डाकू था। वह लोगों को मारकर उनकी उँगलियों की माला पहनता था। उसके नाम से ही लोग काँपते थे।
एक दिन वह महात्मा बुद्ध को मारने के लिए उनके पीछे दौड़ा। बुद्ध शांत भाव से चलते रहे।
अंगुलिमाल जितना तेज़ दौड़ता, बुद्ध उतनी ही शांति से आगे बढ़ते रहे। आखिरकार अंगुलिमाल चिल्लाया— “रुक जाओ!”
बुद्ध ने शांत स्वर में कहा— “मैं तो रुक गया हूँ, अंगुलिमाल। तुम कब रुकोगे?”
यह बात उसके हृदय को छू गई।
फिर बुद्ध ने कहा— “उस पेड़ से एक पत्ता तोड़कर लाओ।”
अंगुलिमाल पत्ता तोड़ लाया।
बुद्ध ने कहा— “अब इसे वापस पेड़ से जोड़ दो।”
अंगुलिमाल बोला— “यह असंभव है।”
बुद्ध मुस्कुराए और बोले— “जब तुम किसी को जीवन दे नहीं सकते, तो तुम्हें उसका जीवन लेने का क्या अधिकार है?”
इन शब्दों ने अंगुलिमाल के भीतर सोई हुई मानवता को जगा दिया। उसका हृदय बदल गया।
उसने हिंसा का मार्ग छोड़ दिया और बुद्ध की शरण में जाकर भिक्षु का जीवन स्वीकार कर लिया।

शिक्षा - यह कहानी हमें सिखाती है कि परिवर्तन कभी भी संभव है। कोई व्यक्ति कितना भी गलत मार्ग पर क्यों न चला गया हो, सही संगति और सही मार्गदर्शन उसके जीवन को बदल सकते हैं।
लेकिन केवल उपदेश सुनना ही पर्याप्त नहीं है। यह भी महत्वपूर्ण है कि हम वह उपदेश किससे सुन रहे हैं?
शूर्पणखा ने रावण को सीता की सुंदरता का वर्णन किया, तो रावण के भीतर काम जाग उठा।
वहीं भगवान श्रीराम ने हनुमानजी को माता सीता के गुणों और सौंदर्य का वर्णन किया, तो उनके हृदय में मातृभाव और आदर और बढ़ गया।
शब्द वही हो सकते हैं, विषय वही हो सकता है, लेकिन वक्ता की चेतना और उसका भाव श्रोता पर बिल्कुल अलग प्रभाव डाल सकता है।
इसीलिए सत्संग इतना महत्वपूर्ण है।
प्रमाणिक भक्त केवल हमें ज्ञान के शब्द नहीं देता, बल्कि उनके शुद्ध आचरण और चेतना का प्रभाव भी हमारे हृदय को बदल सकता है।
श्रीमद्भागवतम् 2.4.18
"किरात-हूणान्ध्र-पुलिन्द-पुल्कशा आभीर-शुम्भा यवनाः खसादयः। येऽन्ये च पापा यदपाश्रयाश्रयाः शुध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः॥"
“किरात, हूण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुल्कस, आभीर, शुम्भ, यवन और खस जातियों के तथा अन्य पापी लोग भी भगवान के भक्तों की शरण ग्रहण करके शुद्ध हो जाते हैं। अत: मैं उन सर्वशक्तिमान भगवान को सादर नमस्कार करता हूँ।”
कभी-कभी एक शुद्ध भक्त का संग, एक सच्चा उपदेश और भगवान की कृपा पूरी जिंदगी बदल देती है।
