International Society for Krishna Consciousness

Founder Acharya — HDG A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada

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बूढ़ी अम्मा और लकड़ियों का गट्ठर
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बूढ़ी अम्मा और लकड़ियों का गट्ठर

​बहुत समय पहले की बात है, एक घने और हरे-भरे जंगल के पास एक छोटा सा गाँव बसा हुआ था। उसी गाँव में एक बूढ़ी अम्मा अपनी छोटी सी झोपड़ी में अकेली रहती थीं।

भाषा:

​बहुत समय पहले की बात है, एक घने और हरे-भरे जंगल के पास एक छोटा सा गाँव बसा हुआ था। उसी गाँव में एक बूढ़ी अम्मा अपनी छोटी सी झोपड़ी में अकेली रहती थीं।

उनके परिवार में कोई नहीं था, और उनकी आजीविका का एकमात्र सहारा था जंगल से सूखी लकड़ियाँ बीनकर बाज़ार में बेचना।

​उम्र के इस पड़ाव पर भी अम्मा रोज़ सुबह जंगल जातीं, लकड़ियाँ इकट्ठा करके एक बड़ा सा गट्ठर बाँधतीं और उसे अपने सिर पर उठाकर बाज़ार तक ले जातीं।

​एक दिन आसमान में काले-काले घने बादल घिर आए और झमाझम बारिश शुरू हो गई।

जंगल का कच्चा रास्ता कीचड़ से भर गया था। अम्मा ने किसी तरह भीगी लकड़ियों का भारी गट्ठर अपने सिर पर रखा और धीरे-धीरे डगमगाते कदमों से घर की ओर बढ़ने लगीं।

​रास्ते में अचानक अम्मा का पैर एक फिसलन भरे पत्थर पर पड़ा और वह लड़खड़ा कर गिर पड़ीं। लकड़ियों का भारी गट्ठर भी ज़मीन पर जा गिरा।

​अम्मा ने उठने की कोशिश की, उनके घुटनों में चोट लग गई थी।

उन्होंने गट्ठर को उठाने का बहुत प्रयास किया, लेकिन कमजोरी और थकान के कारण वह उसे ज़मीन से हिला भी नहीं पा रही थीं।

बारिश तेज़ होती जा रही थी और शाम का अंधेरा घिरने लगा था। ​निराश और लाचार होकर अम्मा ज़मीन पर बैठ गईं और रोते हुए दोनों हाथ जोड़कर पुकारने लगीं—

"हे भगवान! अब मैं क्या करूँ? इस घने जंगल में मेरी मदद करने वाला कोई नहीं है। हे प्रभु, दया करो और मेरी मदद के लिए आओ!"

​अम्मा का रोना इतना सच्चा और व्याकुल था कि अचानक जंगल में चारों ओर एक दिव्य प्रकाश फैल गया। मंद-मंद मुस्कान के साथ स्वयं भगवान श्री कृष्ण अम्मा के सामने प्रकट हो गए।

​भगवान ने बड़े प्रेम से कहा, "अम्मा, आँखें खोलो। तुमने मुझे इतनी करुणा से पुकारा, बताओ तुम्हें क्या चाहिए? आज तुम मुझसे जो चाहो मांग सकती हो—

​अम्मा ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं। सामने साक्षात भगवान खड़े थे, लेकिन अम्मा का ध्यान तो ज़मीन पर पड़े उस लकड़ियों के गट्ठर पर ही अटका था।

​अम्मा हाथ जोड़कर बोलीं, "हे प्रभु! अगर आप सच में मेरी मदद करना चाहते हैं, तो बस कृपा करके इस लकड़ियों के गट्ठर को उठाकर दोबारा मेरे सिर पर रख दीजिए, ताकि मैं इसे बाज़ार में बेचकर आज का खाना खा सकूँ।"

​भगवान मुस्कुराए, उनकी आँखों में जीव की नासमझी पर करुणा थी।

भगवान ने चुपचाप उस गट्ठर को उठाया और अम्मा के सिर पर रख दिया, और देखते ही देखते अंतर्ध्यान हो गए।

अम्मा फिर से उस भारी बोझ को ढोते हुए बाज़ार की ओर चल पड़ीं।

शिक्षा - ​असली खज़ाना मांगना सीखो: जब भगवान स्वयं कृपा करने आते हैं, तब हमें सांसारिक खिलौनों या छोटी-मोटी चीज़ों में नहीं उलझना चाहिए।

​बोझ से मुक्ति: यह संसार उस भारी लकड़ियों के गट्ठर जैसा है, जिसे हम रोज़ ढोते हैं और दुखी होते हैं।

भगवान से प्रार्थना यही होनी चाहिए कि वे हमें इस बोझ से हमेशा के लिए आज़ाद कर दें और अपने चरणों की सच्ची भक्ति दें।

​अम्मा भगवान के सामने होते हुए भी भौतिक कष्टों का गट्ठर ढोने में ही उलझी रहीं।

इसके विपरीत, बालक ध्रुव जब भगवान के सामने पहुँचे, तो उनकी आँखें खुल गईं और उन्होंने श्रीहरि भक्ति सुधाोदय (३.२८) में यह प्रसिद्ध वचन कहा: " ​स्थानाभिलाषी तपसि स्थितोऽहं प्राप्तवान् त्वां मुनीन्द्रैरपि दुर्दशम् । काचं विचिन्वन्नपि दिव्य रत्नं स्वामिन् कृतार्थोऽस्मि वरं न याचे ॥" ​ "हे प्रभु! मैं तो सांसारिक राज्य और ऊँचे पद की कामना लेकर तपस्या करने बैठा था। लेकिन खोज तो मैं काँच के टुकड़े (तुच्छ भौतिक सुख) की कर रहा था और मुझे आप जैसा अमूल्य दिव्य रत्न मिल गया! हे स्वामी, आपके दर्शन पाकर मैं पूर्णतः तृप्त (कृतार्थ) हो गया हूँ, अब मुझे किसी भी सांसारिक वरदान की आवश्यकता नहीं है।"​

​अम्मा ने साक्षात भगवान से 'काँच का टुकड़ा' (संसार का बोझ/गट्ठर) मांग लिया।

​ध्रुव महाराज ने समझ लिया कि जब स्वयं 'दिव्य रत्न' (भगवान) मिल गए हैं, तो संसार के किसी भी वरदान या बोझ की कोई कीमत नहीं बचती।

हरे कृष्ण
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