International Society for Krishna Consciousness

Founder Acharya — HDG A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada

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एक गांव में एक परिश्रमी किसान रहता था। एक दिन उसे एक दुर्लभ 'चीनी बांस' का बीज मिला। उसने पूरी आस्था से खेत की उपजाऊ भूमि में उसे बो दिया।

भाषा:
अनुवाद जल्द उपलब्ध होगा। मूल कहानी नीचे दी गई है।

एक गांव में एक परिश्रमी किसान रहता था। एक दिन उसे एक दुर्लभ 'चीनी बांस' का बीज मिला। उसने पूरी आस्था से खेत की उपजाऊ भूमि में उसे बो दिया। वह जानता था कि इस पौधे की प्रकृति बाकी फसलों से भिन्न है, इसलिए उसने प्रतिदिन सुबह उठकर उसमें जल सींचा, खाद डाली और धूप-छांव से उसकी रक्षा की। ​पूरा एक साल बीत गया, लेकिन धरती के ऊपर जीवन का एक तिनका भी नहीं फूटा। दूसरा साल आया और गुजर गया, फिर तीसरा और चौथा साल भी निकल गया; मगर जमीन का वह टुकड़ा वैसा ही वीरान दिखता रहा जैसे वहां कुछ बोया ही न गया हो। ​गांव के लोग उसका मजाक उड़ाने लगे। कोई कहता, "यह किसान एक बंजर जमीन पर चार साल से पसीना बहा रहा है, इसकी मति मारी गई है।" तो कोई कहता, "उस बीज में कोई प्राण नहीं हैं, समय गंवाना बंद करो।" किंतु किसान विचलित नहीं हुआ। वह बिना किसी शिकायत के हर सुबह अपनी कुदाल और पानी का पात्र लेकर खेत पहुंचता रहा। ​पांचवां साल लगते ही एक चमत्कारी सुबह आई। मिट्टी की परत को चीरकर एक नन्हा-सा हरा अंकुर बाहर निकला। और उसके बाद जो हुआ, उसने पूरी दुनिया को चकित कर दिया। उस अंकुर के फूटने के मात्र छह सप्ताह के भीतर वह बांस 80 फीट की अकल्पनीय ऊंचाई तक पहुंच गया। चार साल तक खाली पड़ी जमीन पर अब एक विशाल, अडिग और गगनचुंबी बांस लहलहा रहा था। ​देखने वालों को लगा कि यह चमत्कार केवल छह हफ्तों में हो गया। किंतु सत्य यह था कि उस बांस को बनने में पूरे पांच साल लगे थे। उन शुरुआती चार वर्षों में, जब ऊपर कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था, वह पौधा जमीन के भीतर सैकड़ों फीट नीचे अपनी जड़ों का एक सुदृढ़ जाल बुन रहा था। यदि उसने चार साल तक अपनी अदृश्य नींव मजबूत न की होती, तो पांचवें साल में 80 फीट की विशाल ऊंचाई और तूफानी हवाओं के झोंके उसे पलभर में धराशायी कर देते। ​आध्यात्मिक दृष्टिकोण: 'श्री उपदेशामृत' का सूत्र ​भक्ति और साधना के मार्ग पर भी यही नियम लागू होता है। महान वैष्णव आचार्य श्रील रूप गोस्वामी 'श्री उपदेशामृत' (श्लोक 3) में साधक की सफलता के छह अनिवार्य स्तंभ बताते हैं: ​उत्साहान्निश्चयाद्धैर्यात्तत्तत्कर्मप्रवर्तनात्। सङ्गत्त्यागात्सतो वृत्तेः षड्भिर्भक्तिः प्रसिध्यति॥ ​इस श्लोक के शुरुआती तीन शब्द—उत्साह, निश्चय और धैर्य—इस किसान और बांस की कहानी का वास्तविक प्राण हैं: ​उत्साहात् (उत्साह): चार साल तक परिणाम शून्य दिखा, फिर भी किसान का कर्म के प्रति उमंग और लगन कम नहीं हुई। आध्यात्मिक जीवन में भी जब मन नहीं लगता या तुरंत अनुभूति नहीं होती, तब भी नित्य नियम से भजन, जप और सेवा में लगे रहना ही सच्चा उत्साह है। ​निश्चयात् (निश्चय): जब पूरी दुनिया किसान पर हंस रही थी, तब भी उसका यह दृढ़ संकल्प था कि बीज के भीतर जीवन विद्यमान है और वह व्यर्थ नहीं जाएगा। इसी प्रकार सांसारिक लोगों के तानों के बीच साधक का यह दृढ़ विश्वास होना कि "भगवान का नाम और शास्त्र कभी झूठे नहीं हो सकते," निश्चय कहलाता है। ​धैर्यात् (धैर्य): किसान ने उतावली में आकर मिट्टी नहीं खोदी कि बीज अंकुरित हुआ या नहीं। उसने प्रकृति के समय का सम्मान किया। भक्ति मार्ग में भी तुरंत चमत्कार या सिद्धियों की अपेक्षा न करके, फल को प्रभु के चरणों में छोड़कर प्रतीक्षा करना ही धैर्य है।

​शिक्षा:- जब आप सही दिशा में निरंतर प्रयास कर रहे हों और बाहर कोई प्रगति न दिखे, तो निराश न हों। वह समय आपकी आंतरिक जड़ों, चरित्र और निष्ठा को गहरा करने का होता है। जिस साधना में उत्साह का संवेग, निश्चय का संकल्प और धैर्य का संबल होता है, उसकी नींव इतनी गहरी हो जाती है कि सही समय आने पर उसकी सफलता को संसार का कोई भी तूफान डिगा नहीं सकता।

हरे कृष्ण
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