एक राजा था, उसकी 10 रानियां थीं। एक बार वह राजा अपने व्यापार के काम के लिए दूर देश गया था।
एक महीने के लिए बाहर जाने के कारण वह बहुत उदास हो गया था और उसे अपने घर की रानियों की बहुत याद आ रही थी।
उसने एक सैनिक के हाथ अपनी रानियों को संदेश भेजा और पूछा कि तुम्हें क्या-क्या चाहिए? तुम एक पत्र में लिखकर दे दो, मैं तुम सबके लिए जो चाहोगी वह ले आऊंगा।
सभी रानियों ने उस पत्र को पढ़ा और बड़ी खुश हुईं। फिर सोचने लगीं कि मैं अपने पति से क्या मंगवाऊं? किसी ने सोचा कि मैं साड़ी लिख देती हूं, किसी ने सोचा मैं हीरे की अंगूठी मंगवा लेती हूं, किसी ने हीरे के हार की मांग करी।
पर जो सबसे छोटी रानी थी, उसने पत्र में सिर्फ लाल स्याही से "सा" लिखा। राजा इस बात को समझ नहीं पाए। फिर वह एक विद्वान के पास गए और उन्हें वह पत्र दिखाया।
उस विद्वान ने उसे पढ़ा और वह मुस्कुराए। उन्होंने कहा, "राजन्! तुम्हारी इस पत्नी को संसार की किसी वस्तु की लालसा नहीं है, उसे तो सिर्फ तुमसे मिलने की 'लाल-सा' (लालसा) है। वह केवल आपको चाहती है।"
जब राजा ने यह सुना तो उसकी आंखों में अश्रु आ गए, वह प्रेम से सराबोर हो गया। उसने सभी रानियों के लिए उनकी पसंद का सामान लिया—किसी के लिए हीरों का हार, किसी के लिए अंगूठी, किसी के लिए सुंदर वस्त्र और सबको भेंट कर दिया। आखिर में, छोटी रानी के पास राजा स्वयं चले गए और बाकी रानियां देखती रह गईं।

श्रीमद्भागवत महापुराण में वृत्तासुर ने भगवान से यही प्रार्थना करते हुए कहा था:
"न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठ्यं न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम्। न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा समञ्जस त्वा विरहय्य काङ्क्षे॥
(श्रीमद्भागवत ६.११.२५)
" हे प्रभु! आपको छोड़कर (आपके विरह में) मुझे न तो स्वर्ग का सुख चाहिए, न ब्रह्मा का पद, न पृथ्वी का साम्राज्य, न रसातल का आधिपत्य, न योग की सिद्धियां और न ही मोक्ष की इच्छा है। मुझे तो केवल आप ही चाहिए।
महाभारत का प्रमाण: अर्जुन और दुर्योधन। इतिहास गवाह है कि जब भी जीव ने भगवान की शक्तियों और भगवान के स्वयं के रूप में से किसी एक को चुनना चाहा, तो जिसने भगवान को चुना, वही परम सुखी और विजयी हुआ।
महाभारत युद्ध से ठीक पहले, दुर्योधन और अर्जुन दोनों भगवान श्रीकृष्ण के पास सहायता मांगने द्वारका गए थे।
भगवान ने उनके सामने दो विकल्प रखे—एक तरफ उनकी विशाल, अजेय 'नारायणी सेना' और दूसरी तरफ वे स्वयं अकेले (वह भी बिना अस्त्र उठाए)।
दुर्योधन की सोच: दुर्योधन ने संसार की शक्ति यानी भगवान की नारायणी सेना को चुना। अर्जुन का समर्पण: अर्जुन ने छोटी रानी की तरह सब कुछ छोड़कर केवल नारायण (श्रीकृष्ण) को चुना।
परिणाम क्या हुआ? दुर्योधन के पास विशाल सेना थी, फिर भी उसकी हार हुई। अर्जुन के पास केवल निहत्थे श्रीकृष्ण थे, फिर भी पांडवों की महा विजय हुई। क्योंकि जहां रचयिता स्वयं साथ हो, वहां पराजय असंभव है।
श्रीमद्भगवद्गीता का अंतिम श्लोक(संजय द्वारा) इसी सत्य की घोषणा करता है: "यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥ (गीता १८.७८)अर्थ: जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी अर्जुन हैं, वहीं पर ऐश्वर्य, विजय, विभूति (अलौकिक शक्ति) और अचल नीति है—ऐसा मेरा मत है।
शिक्षा - यह कहानी हमें सिखाती है कि भगवान से उनकी दी हुई भौतिक चीजें (धन, दौलत, सुख) मांगने से कहीं बेहतर है कि हम स्वयं भगवान को ही मांग लें। जो भगवान की बनाई चीजों को मांगता है, उसे केवल वस्तुएं मिलती हैं; पर जो भगवान को मांग लेता है,वो किसी चीज से वंचित नहीं रहता क्योंकि भगवान स्वयं उसके हो जाते हैं।
