International Society for Krishna Consciousness

Founder Acharya — HDG A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada

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हमारे जीवन में गुरु की आवश्यकता
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हमारे जीवन में गुरु की आवश्यकता

एक बार ग्वाला अपनी गायों को चराने के लिए जंगल में ले गया। उसमें वे एक गाय घास चरती हुई बहुत अंदर चली गई । अचानक उसने देखा कि एक बाघ उसकी ओर तेजी से दौड़ता हुआ आ रहा है। गाय मुड़ी और डरकर भागने लगी। उसे भय था कि बाघ किसी भी क्षण अपने पंजे उसके शरीर में गड़ा देगा।

भाषा:

एक बार ग्वाला अपनी गायों को चराने के लिए जंगल में ले गया। उसमें वे एक गाय घास चरती हुई बहुत अंदर चली गई । अचानक उसने देखा कि एक बाघ उसकी ओर तेजी से दौड़ता हुआ आ रहा है। गाय मुड़ी और डरकर भागने लगी। उसे भय था कि बाघ किसी भी क्षण अपने पंजे उसके शरीर में गड़ा देगा।

गाय ने बचने के लिए कोई जगह तलाशनी शुरू की। अंत में उसे एक छोटा-सा तालाब दिखाई दिया, जो बाघ की पहुँच से लगभग बाहर था। गाय तालाब में कूद गई और उसका पीछा करते-करते बाघ भी उसमें छलांग लगा बैठा।

दोनों को आश्चर्य हुआ क्योंकि तालाब बहुत उथला दिख रहा था, लेकिन उसमें गहरी कीचड़ थी। गाय और बाघ कीचड़ में अपनी गर्दन तक फँस गए।खतरा बढ़ता जा रहा था ।

दोनों के सिर पानी से ऊपर थे, लेकिन वे चाहे जितना प्रयास करते, स्वयं को बाहर नहीं निकाल पा रहे थे।

बाघ बार-बार गाय पर गुर्राया और बोला, “मैं अभी तुम्हारी हड्डियाँ अपने दाँतों से चबाकर खाने वाला हूँ!”

लेकिन अब बाघ स्वयं भी बहुत परेशान हो गया था, क्योंकि उसे निकलने का कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था।

गाय ने बाघ को संघर्ष करते हुए देखा और उससे पूछा, “क्या तुम्हारा कोई स्वामी है?” बाघ ने तिरस्कारपूर्वक उत्तर दिया, “मैं जंगल का राजा हूँ। तुम मुझसे मेरे स्वामी के बारे में क्यों पूछ रही हो?मेरा कोई स्वामी नहीं है ,मैं स्वयं ही अपना स्वामी हूँ!”

गाय ने कहा, “तुम स्वयं को जंगल का राजा कहते हो, फिर भी तुम अपना जीवन नहीं बचा पा रहे हो!” बाघ ने पूछा, “और तुम्हें क्या लगता है कि तुम यहाँ मरने वाली नहीं हो?”

गाय ने शांत भाव से उत्तर दिया, “मैं इस कीचड़ से स्वयं को मुक्त नहीं कर सकती, लेकिन मेरे स्वामी मुझे बचा सकते हैं। जब सूर्य अस्त होगा और वे मुझे ढूँढ़ने आएँगे, तो वे मुझे यहां से निकाल कर अपने घर ले जाएँगे।”

बाघ कुछ देर चुप रहा और गाय को घूरता रहा। कुछ समय बाद सूर्य अस्त हो गया और गाय का स्वामी वहाँ पहुँचा। उसने तुरंत गाय की स्थिति को समझ लिया। उसने गाय को बाहर निकाला और सुरक्षित स्थान पर ले गया।

घर जाते समय गाय और उसके स्वामी—दोनों के हृदय में एक-दूसरे के प्रति गहरा आभार था। उन्होंने उस बाघ को भी देखा और मन ही मन चाहा कि किसी प्रकार वह भी इस संकट से बच जाए।

हमारे जीवन में गुरु की आवश्यकता

कहानी का आध्यात्मिक भाव

गाय — समर्पित हृदय बाघ — अहंकारी मन स्वामी — गुरु कीचड़ — यह भौतिक संसार भागना/पीछा करना — संसार में अस्तित्व के लिए संघर्ष

श्रीमद भागवतम(११.२०.१७) का ये श्लोक हमारे जीवन में गुरु की महिमा को दर्शाते है:- "नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम्।मयानुकूलेन नभस्वतेरितं पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स आत्महा॥" मानव देह, जो जीवन के समस्त पुरुषार्थों और लाभों को प्रदान करने में सक्षम है, प्रकृति के नियमों के अंतर्गत स्वतः ही प्राप्त होती है, यद्यपि यह अत्यंत दुर्लभ उपलब्धि है। इस मानव शरीर की तुलना एक सुदृढ़ रूप से निर्मित नौका से की जा सकती है, जिसके कर्णधार (कप्तान) आध्यात्मिक गुरु हैं और स्वयं भगवान के निर्देश इसे मार्ग पर अग्रसर करने वाली अनुकूल पवन के समान हैं। इन समस्त सुअवसरों पर विचार करते हुए, जो मनुष्य अपने इस मानव जीवन का उपयोग संसार-सागर को पार करने के लिए नहीं करता, वह जीवन के वास्तविक उद्देश्य और आध्यात्मिक उन्नति के इस अनमोल अवसर को पूर्णतः व्यर्थ कर देता है।वो आत्मा का हनन करते वाला कहलाता है।

शिक्षा - गुरु के होने का अर्थ ये नहीं है , कि आप कमजोर है, या कभी नहीं फँसेंगे या आपको कोई कठिनाई नहीं आएगी। इसका अर्थ यह है कि कठिन परिस्थिति में आप अकेले नहीं हैं—आपके पास किसी अधिक शक्तिशाली और योग्य व्यक्ति की सहायता है,जो आपके मदद के लिए हमेशा आपके साथ खड़ा है।
हरे कृष्ण
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