एक बार एक राजा ने अपने पूरे राज्य में घोषणा करवाई— “कल मैं अपना राजदरबार सबके लिए खोल दूँगा। जो व्यक्ति जिस वस्तु को छू लेगा, वह वस्तु उसी की हो जाएगी।”
यह सुनते ही पूरे राज्य में उत्साह फैल गया। लोग रात भर योजनाएँ बनाने लगे। किसी ने सोचा— “मैं हाथी को छुऊँगा, वह मेरा हो जाएगा।” किसी ने कहा— “मैं घोड़े ले लूँगा।” किसी ने निश्चय किया— “मैं राजा के बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण छुऊँगा।”
कोई सिंहासन चाहता था, कोई सोने की अशर्फियाँ, कोई चाँदी, कोई महँगी सजावट की वस्तुएँ। सबकी इच्छाएँ अलग थीं, पर लक्ष्य एक ही था— अधिक से अधिक प्राप्त करना।
अगले दिन दरबार खुला। भीड़ दौड़ पड़ी। हर कोई डर रहा था कि कहीं उसकी पसंद की वस्तु कोई और न ले जाए। किसी ने हाथी छू लिया, किसी ने घोड़ा, किसी ने वस्त्र, किसी ने आभूषण, किसी ने सोना-चाँदी।
तभी एक छोटी-सी लड़की दौड़ती हुई आई और धीरे से जाकर राजा को ही छू लिया। राजा आश्चर्यचकित भी हुआ और अत्यंत प्रसन्न भी। लड़की मुस्कुराकर बोली— मुझे केवल आप चाहिए।

हम भगवान से वस्तुएँ माँगते हैं, पर विरले ही भगवान को माँगते हैं।
भगवद्गीता में भगवान कहते हैं— मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥ (गीता 7.3)
हजारों मनुष्यों में कोई एक सिद्धि के लिए प्रयास करता है, और उन सिद्ध पुरुषों में भी कोई विरला ही मुझे तत्त्व से जान पाता है।
शिक्षा - धन, वैभव और संसार की सारी वस्तुएँ यहीं रह जाएँगी। “धरा का सामान, धरा पर ही धरा रह जाएगा।” इसलिए प्रार्थना करनी चाहिए - हे प्रभु! मुझे आपकी वस्तुएँ नहीं, आपका प्रेम चाहिए। मुझे आपका वैभव नहीं, आपकी भक्ति चाहिए। मुझे संसार नहीं, आप चाहिए।”
