International Society for Krishna Consciousness

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श्रील प्रभुपाद और केकड़े का प्रसंग
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श्रील प्रभुपाद और केकड़े का प्रसंग

एक बार श्रील प्रभुपाद अपने शिष्यों के साथ Morning Walk पर समुद्र के किनारे जा रहे थे।

भाषा:

एक बार श्रील प्रभुपाद अपने शिष्यों के साथ Morning Walk पर समुद्र के किनारे जा रहे थे।

अचानक प्रभुपाद की नजर एक केकड़े पर पड़ी।

उन्होंने ब्रह्मानन्द प्रभु से कहा— “उस केकड़े को पकड़कर मेरे पास लाओ।”

ब्रह्मानन्द प्रभु बहुत हट्टे-कट्टे और बलवान थे।

उन्होंने सोचा, केकड़ा ही तो है, इसे पकड़ना कौन-सी बड़ी बात है!

लेकिन जैसे ही वे केकड़े को पकड़ने गए, केकड़ा बार-बार उनके हाथ से निकल जाता।

वे पूरी कोशिश करते रहे… बहुत संघर्ष किया… लेकिन केकड़ा पकड़ में नहीं आया। और देखते ही देखते केकड़ा समुद्र में चला गया।

ब्रह्मानन्द प्रभु निराश होकर वापस प्रभुपाद के पास आए।

प्रभुपाद ने पूछा— “क्या हुआ? तुम इतने हट्टे-कट्टे हो, फिर इतने छोटे से केकड़े को पकड़ क्यों नहीं पाए?”

ब्रह्मानन्द प्रभु के पास कोई उत्तर नहीं था।

तब श्रील प्रभुपाद ने एक बहुत गहरी बात समझाई—

“क्योंकि उस केकड़े ने विशाल समुद्र का आश्रय ले लिया था।” समुद्र का आश्रय लेने से, तुम्हारी सारी शक्ति उसके सामने व्यर्थ हो गई।

फिर प्रभुपाद ने इस घटना से आध्यात्मिक शिक्षा दी— माया बहुत शक्तिशाली है। हम कितने भी बलवान क्यों न हों, कितने भी बुद्धिमान क्यों न हों, माया हमें आसानी से अपने वश में कर सकती है।

लेकिन… जब जीव भगवान कृष्ण का आश्रय ले लेता है, जो स्वयं मायापति हैं, तो माया जीव को छू भी नहीं सकती।

शिक्षा - जिस प्रकार समुद्र के आश्रय में जाकर केकड़ा सुरक्षित हो गया, उसी प्रकार— कृष्ण के आश्रय में जाकर जीव माया से सुरक्षित हो जाता है। इसलिए जीवन में अपनी शक्ति पर नहीं, कृष्ण के आश्रय पर भरोसा रखिए।

भगवान श्रीकृष्ण भगवद्गीता में कहते हैं—

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥ — भगवद्गीता 7.14

“यह मेरी दैवी माया, जो तीन गुणों से बनी है, अत्यंत दुस्तर है। लेकिन जो जीव मेरी शरण में आ जाते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।”

श्रील प्रभुपाद और केकड़े का प्रसंग
हरे कृष्ण
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