एक बार एक कुशल सपेरा (बांसुरी वादक) अपने गांँवों और नगरों में सांपों का खेल दिखाकर अपनी जीविका चलाता था। उसके पास एक बहुत ही बड़ा, काला और अत्यंत जहरीला कोबरा सांप (नागराज) था। सपेरा रोज़ सुबह बाज़ार के बीचों-बीच अपनी टोकरी रखता, अपनी बीन (बांसुरी) निकालता और एक विशेष धुन बजाना शुरू करता। बीन की उस सम्मोहक धुन को सुनकर वह भयंकर कोबरा सांप टोकरी से अपना विशाल फन उठाकर बाहर आता और संगीत की लय पर झूमने लगता। सपेरे को अपनी कला पर बहुत अहंकार था। वह सोचता था, "देखो, यह जहरीला सांप, जिसके एक डंक से हाथी भी मर सकता है, वह मेरी उँगलियों पर नाचता है। मैंने इसे पूरी तरह वश में कर लिया है।" सपेरा खेल दिखाते-दिखाते इतना निडर हो गया था कि वह कभी-कभी सांप को अपने गले में लपेट लेता, तो कभी उसके फन पर हाथ फेरने लगता। दर्शक तालियाँ बजाते और सपेरा गर्व से मुस्कुराता। सपेरे और सांप का यह रिश्ता कई वर्षों तक चला। सांप चुपचाप बीन की धुन पर नाचता रहा। सपेरे को पूरा विश्वास हो गया कि सांप उसका 'मित्र' बन चुका है और अब वह उसे कभी नहीं काटेगा। लेकिन एक दिन, रोज़ की तरह बाज़ार में खेल चल रहा था। सपेरा अपनी बीन बजाने में पूरी तरह मग्न था और कोबरा झूम रहा था। अचानक, बीन बजाते समय सपेरे की उंगली से एक छोटी सी चूक हुई और बीन की लय (धुन) थोड़ी सी बदल गई। संगीत की वह लय बदलते ही कोबरा का सम्मोहन (Hypnotism) टूट गया। अपनी स्वाभाविक हिंसक प्रवृत्ति (Natural Instinct) के कारण, सांप ने क्षण भर की भी देरी नहीं की। उसने फुफकार मारते हुए सीधे सपेरे के गले पर प्राणघातक डंक मार दिया। सपेरे के शरीर में जहर फैल गया, बीन उसके हाथ से छूट गई और वह वहीं तड़पकर मर गया। वह सांप जिसे वह अपना वश में किया हुआ गुलाम समझता था, वही उसकी मृत्यु का कारण बन गया।
कहानी का आध्यात्मिक संदेश
श्रील प्रभुपाद इस कहानी के माध्यम से हमारे जीवन की एक कड़वी सच्चाई को उजागर करते थे: १.सांप हमारी भौतिक इंद्रियों (Senses) का प्रतीक है: यह भयंकर कोबरा सांप हमारी इंद्रियाँ, वासनाएँ और मन हैं (जैसे काम, क्रोध, लोभ, जीभ का स्वाद आदि)। भौतिकवादी व्यक्ति सोचता है कि उसने अपनी आदतों और इंद्रियों को नियंत्रण में कर रखा है। वह सोचता है, "मैं थोड़ी सी शराब पीता हूँ, थोड़ा जुआ खेलता हूँ या थोड़ी वासना में लिप्त रहता हूँ, लेकिन सब कुछ मेरे कंट्रोल में है।" यह बिल्कुल सपेरे जैसा भ्रम है। २.माया की झूठी बांसुरी: जब तक भौतिक प्रकृति की परिस्थितियाँ हमारे अनुकूल चल रही होती हैं (जब तक सपेरे की बीन सही बज रही होती है), तब तक हमें लगता है कि हमारा मन और हमारी परिस्थितियाँ हमारे वश में हैं। लेकिन इंद्रियों का स्वभाव सांप जैसा ही जहरीला है; वे कभी किसी की सगी नहीं होतीं। ३.काल का अचानक प्रहार: जैसे ही जीवन में थोड़ा सा उतार-चढ़ाव आता है, या बुढ़ापा और बीमारी (लय बदलना) आती है, वैसे ही यह अनियंत्रित मन और इंद्रियाँ हमें अवसाद (Depression), पाप और विनाश के कुएँ में धकेल देती हैं। अंततः 'काल' (मृत्यु) उस सांप की तरह अचानक आकर हमारे जीवन का अंत कर देता है, और हम हाथ मलते रह जाते हैं। ४.सांप पर कभी भरोसा नहीं किया जा सकता: श्रील प्रभुपाद चाणक्य पंडित के नीति शास्त्र का संदर्भ देते हुए कहते थे कि दुष्ट व्यक्ति और सांप पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए। आप एक जहरीले सांप को कितना भी दूध पिलाएं या संगीत सुनाएं, उसका जहर खत्म नहीं होता। इसी तरह, जब तक भौतिक इच्छाओं को कृष्ण-भक्ति से शुद्ध नहीं किया जाता, तब तक वे कभी भी हमारे पतन का कारण बन सकती हैं।
अपनी भौतिक योग्यताओं या इंद्रियों पर कभी यह अहंकार मत कीजिए कि वे आपके नियंत्रण में हैं। असली बुद्धिमान वह है जो इन इंद्रियों रूपी सर्प के दांत ही उखाड़ देता है। और इनके दांत कैसे उखड़ेंगे? इंद्रियों को भगवान श्री कृष्ण की सेवा में लगाकर। जब आंखें भगवान के दर्शन करेंगी, कान हरिनाम सुनेंगे और जीभ कृष्ण-प्रसाद चखेगी, तब यह सांप (मन) कभी हमें नुकसान नहीं पहुँचा पाएगा।
