एक किसान था, पाहोम। उसके पास सब कुछ था—घर, परिवार और भरपूर ज़मीन। लेकिन उसके मन में हमेशा एक ही फांस चुभती रहती थी—"थोड़ी और ज़मीन मिल जाए तो बस जीवन संवर जाए।" एक दिन उसे एक अनोखा अवसर मिला। एक कबीले के सरदार ने उससे कहा: "सुबह सूरज उगने से लेकर शाम को सूरज ढलने तक, तुम पैदल चलकर जितनी ज़मीन घेर लोगे, वह सब तुम्हारी होगी। शर्त बस एक है—सूर्यास्त से पहले तुम्हें उसी जगह वापस लौटना होगा जहाँ से तुमने शुरुआत की थी।" पाहोम सुबह-सुबह उमंग से भर कर निकल पड़ा। कुछ मील चलने के बाद उसने पीछे मुड़कर देखा और सोचा—"इतनी ज़मीन तो काफी है..." लेकिन तभी उसके मन ने फुसफुसाया—"थोड़ा और आगे बढ़ो, वहाँ की मिट्टी और उपजाऊ है।" वह आगे बढ़ता गया... और थोड़ा... और थोड़ा...। जब सूरज सिर पर आया, तब भी उसकी भूख शांत नहीं हुई। दोपहर ढलने लगी, तो उसे अचानक अहसास हुआ कि उसे वापस भी लौटना है। अब पाहोम पूरी ताकत से वापस अपनी शुरुआती रेखा की तरफ दौड़ा। उसका दिल फटने को था, सांसें उखड़ रही थीं, पैर जवाब दे रहे थे। वह हांफते हुए, गिरते-पड़ते सूर्यास्त की आखिरी किरण के साथ ठीक अपनी जगह पर पहुंच तो गया... लेकिन वहीं ढेर हो गया। उसके मुंह से खून निकल आया और उसकी मृत्यु हो गई। जिस असीम ज़मीन के लिए वह दिन भर दौड़ता रहा, अंत में उसे कितनी ज़मीन मिली? सिर्फ छह फीट—उतनी ही, जिसमें उसे दफनाया जा सके। ययाति का बोध: आग में घी टॉल्स्टॉय का पाहोम तो एक काल्पनिक पात्र था, लेकिन हज़ारों साल पहले भारत के इतिहास में राजा ययाति के रूप में एक वास्तविक 'पाहोम' हो चुका है। राजा ययाति ने अपनी काम-वासना और इच्छाओं को तृप्त करने के लिए अपने सगे पुत्र से उसकी जवानी तक उधार ले ली थी। हज़ारों सालों तक हर सुख भोगने के बाद भी जब उनका मन नहीं भरा, तब उन्हें वही सच समझ आया जो पाहोम मौत के मुहाने पर भी नहीं समझ पाया था। तब ययाति ने श्रीमद्भागवतम् (9.19.14) में एक अमर सत्य कहा था: "न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति। हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्द्धते ॥" अर्थ: इच्छाएं कभी भी भोगने से शांत नहीं होतीं। जिस तरह आग में घी (हवि) डालने से आग बुझती नहीं, बल्कि और भड़क उठती है, ठीक वैसे ही "थोड़ा और" पाने की चाहत हमारी तृष्णा की आग को और तेज कर देती है। पाहोम ज़मीन के हर नए टुकड़े के रूप में अपनी इच्छा की आग में घी ही तो डाल रहा था। गीता का समाधान: समुद्र जैसी स्थिरता अगर पाहोम इस 'ययाति-सत्य' को समझ लेता, तो वह जीवन की इस आत्मघाती दौड़ से बच जाता। इसी स्थिति का सुंदर समाधान भगवद्गीता (2.70) में भगवान श्रीकृष्ण देते हैं:
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् । तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥
अर्थ: जैसे चारों ओर से नदियाँ निरंतर आकर समुद्र में मिलती हैं, फिर भी समुद्र अपनी मर्यादा में अडिग और स्थिर रहता है, वैसे ही जिस व्यक्ति के भीतर इच्छाएं तो आएं, पर वह उनसे विचलित न हो—वही वास्तविक शांति पाता है। वह नहीं, जो इच्छाओं के पीछे पागलों की तरह दौड़ता (कामकामी) रहता है।
जीवन का सार:-
पाहोम के पास ज़मीन की कमी नहीं थी, संतोष की कमी थी। जीवन में आगे बढ़ना, लक्ष्य तय करना बिल्कुल गलत नहीं है। लेकिन "थोड़ा और" की अंधी दौड़ में आज हमारे पास जो कुछ भी है, उसकी खुशियों को दांव पर लगा देना सबसे बड़ी नासमझी है। संतोष का मतलब ठहर जाना या निकम्मा हो जाना नहीं है; संतोष का असली अर्थ है—"बाहर से आगे बढ़ते रहना, पर भीतर से समुद्र की तरह शांत और स्थिर रहना।"
