एक बार एक भक्त दीक्षा लेना चाहता था। वह अपने गुरुजी के पास गया और विनम्रतापूर्वक बोला, “गुरुजी, कृपया मुझे दीक्षा प्रदान कीजिए।” गुरुजी ने पूछा, “तुम्हें क्या लगता है, तुममें दीक्षा लेने की क्या योग्यता है?” भक्त ने पूछा, “गुरुजी, आप मुझमें कौन-सी योग्यता देखना चाहते हैं?” गुरुजी बोले, “मैं तुम्हें 24 घंटे का समय देता हूँ। इन 24 घंटों में वृंदावन में कम-से-कम एक ऐसे व्यक्ति को खोजकर लाओ, जिसे तुम स्वयं से निम्न सिद्ध कर सको।” भक्त ने मन ही मन सोचा, “गुरुजी ने मुझे 24 घंटे क्यों दिए? मैं तो 24 मिनट में, बल्कि 24 सेकंड में ही यह कर सकता हूँ!” वह बाहर निकला और एक रिक्शावाले को बुलाकर बोला, “मुझे इस जगह ले चलो।” रास्ते में उसके मन में विचार आया, “कल मैं इस रिक्शावाले को गुरुजी के पास ले जाऊँगा और कहूँगा कि यह मुझसे निम्न है। मैं इसे पैसे देता हूँ और यह मेरे लिए काम करता है।” लेकिन जब वह अपने घर पहुँचा तो उसके मन में एक दूसरा विचार आया। “मेरे पैसे मुझे स्वयं मेरे घर तक नहीं ला सकते। इस रिक्शावाले ने मुझे मेरे घर तक पहुँचाया। जिस काम को मैं स्वयं नहीं कर सकता, उसमें तो यह मुझसे श्रेष्ठ है। फिर मैं इसे अपने से निम्न कैसे मान सकता हूँ?” वह आगे बढ़ा। घर के सामने कुछ सब्जीवाले बैठे थे। उसने उनसे सब्जियाँ खरीदीं और पैसे दिए। उसके मन में फिर विचार आया, “इनमें से किसी एक को गुरुजी के पास ले जाऊँगा और कहूँगा कि ये मुझसे निम्न हैं। मैं पैसे देता हूँ और ये मेरे लिए सब्जियाँ बेचते हैं।” लेकिन कुछ ही देर बाद उसके मन में फिर विचार आया, “मैं सब्जियाँ उगाना तो दूर, अपने लिए अन्न का एक दाना भी पैदा नहीं कर सकता। यदि किसान और सब्जीवाले मेरे लिए अन्न और सब्जियाँ न उगाएँ, तो मैं खाऊँगा क्या? वास्तव में, मैं इनसे भी श्रेष्ठ नहीं हूँ।” अब उसकी दृष्टि बदलने लगी। वह जिस व्यक्ति को भी देखता, उसमें कोई न कोई ऐसा गुण दिखाई देता, जो उसमें स्वयं नहीं था। कोई उससे अधिक मेहनती था, कोई अधिक धैर्यवान, कोई किसी कला में निपुण था, तो कोई दूसरों की सेवा करने में आगे था। धीरे-धीरे उसे महसूस होने लगा— “हर व्यक्ति में कम-से-कम एक ऐसा गुण है, जिसमें वह मुझसे श्रेष्ठ है।” पूरा दिन बीत गया। लेकिन वह एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं खोज पाया जिसे वह स्वयं से निम्न मान सके। अगली सुबह वह बहुत चिंतित होकर उठा। उसने सोचा, “गुरुजी ने मुझे 24 घंटे दिए थे, लेकिन मैं वृंदावन में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं खोज पाया जो मुझसे निम्न हो। अब क्या मुझे दीक्षा मिलेगी?” इसी चिंता में जब वह शौचालय गया, तो उसकी दृष्टि अपने ही मल के छोटे-छोटे कीड़ो पर पड़ी। उसने सोचा, “कम-से-कम ये तो मुझसे निम्न हैं। मैं इनसे श्रेष्ठ हूँ।” लेकिन स्नान करते समय उसने इस बात पर फिर विचार किया। अचानक उसके मन में एक और विचार आया— “मैं कृष्ण का स्वादिष्ट प्रसाद ग्रहण करता हूँ और अंततः उसे त्याग देता हूँ। लेकिन ये छोटे-से जीव उसी त्यागी हुई वस्तु से अपना जीवन चला लेते हैं। जिस चीज़ को मैं बेकार समझकर छोड़ देता हूँ, उसमें भी ये अपना जीवनयापन कर लेते हैं। फिर मैं इन्हें अपने से निम्न कैसे मान सकता हूँ?” अब उसकी आँखें खुल चुकी थीं। उसे समझ आ गया— “मैं किसी को भी अपने से निम्न नहीं मान सकता। हर जीव में कोई न कोई गुण है, कोई न कोई योग्यता है और मुझमें सुधार की अभी भी बहुत गुंजाइश है।” वह तुरंत गुरुजी के पास गया। वहाँ उस समय कोई और नहीं था। उसने गुरुजी के सामने हाथ जोड़कर कहा, “गुरुजी, मुझे क्षमा कीजिए। आपने मुझे 24 घंटे में एक ऐसे व्यक्ति को खोजने के लिए कहा था जिसे मैं अपने से निम्न सिद्ध कर सकूँ। लेकिन मैं वृंदावन में एक भी ऐसा व्यक्ति—चाहे मनुष्य हो या कोई छोटा-सा जीव—नहीं खोज पाया जो मुझसे निम्न हो। हर किसी में कम-से-कम एक ऐसा गुण है, जिसमें वह मुझसे श्रेष्ठ है। इसलिए अब मुझे लगता है कि मैं दीक्षा लेने के योग्य नहीं हूँ।” गुरुजी मुस्कुराए और बोले, “यही तो दीक्षा लेने की योग्यता है।” भक्त ने आश्चर्य से गुरुजी की ओर देखा। गुरुजी बोले, “कल तक तुम अपने भीतर श्रेष्ठता खोज रहे थे और दूसरों में हीनता। आज तुम दूसरों में गुण और अपने अंदर कमियाँ देख पा रहे हो। तुमने अपने अहंकार को पहचान लिया है। यही विनम्रता भक्ति के मार्ग की पहली सीढ़ी है।” फिर गुरुजी ने कहा, “अब मैं तुम्हें दीक्षा दूँगा।” भगवान श्रीकृष्ण भगवद्गीता के 13वें अध्याय में ज्ञान के लक्षण बताते हुए कहते हैं— “अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्…” अर्थात् अमानित्वम् — अपने लिए मान-सम्मान की अपेक्षा न रखना और स्वयं को श्रेष्ठ न मानना। और अदम्भित्वम् — अपनी महानता का दिखावा न करना। यही इस कहानी का सार है। जब तक हम सोचते हैं— “मैं दूसरों से श्रेष्ठ हूँ।” तब तक हमारे भीतर अहंकार है। लेकिन जिस दिन हमें लगने लगे— “हर व्यक्ति में मुझसे कुछ अच्छा है और मुझे अभी बहुत कुछ सीखना है,” उस दिन हमारे भीतर विनम्रता का जन्म होता है। और यही भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ने की वास्तविक योग्यता है।

शिक्षा - दीक्षा केवल मंत्र प्राप्त करना नहीं है; दीक्षा का अर्थ है—अपने अहंकार को धीरे-धीरे समाप्त करके गुरु और भगवान के सामने विनम्र होना, "तृणादपि सुनिचेन" दूसरों में गुण देखना और अपने अंदर सुधार की गुंजाइश देखना—यही सच्ची आध्यात्मिक योग्यता है। ए।”
