एक गुरु अपने कुछ शिष्यों को एक श्लोक सिखा रहे थे:
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥
गुरुजी बच्चों को श्लोक समझा रहे थे और बच्चे उसे सीख रहे थे। तभी एक बच्चे के मन में एक प्रश्न आया।
उसने पूछा, “गुरुजी, हम प्रतिदिन कृष्ण को इतना सारा भोग अर्पित करते हैं। इस श्लोक में भगवान कहते हैं कि जो व्यक्ति मुझे प्रेम और भक्ति से कुछ अर्पित करता है, मैं उसे स्वीकार करता हूँ। लेकिन जब हम कृष्ण को भोग लगाते हैं, तो ऐसा क्यों नहीं लगता कि कृष्ण ने उसे स्वीकार किया है?”
“हम गरमा-गरम प्रसाद—चपाती, चावल, दाल, सब्जी आदि भगवान को अर्पित करते हैं। घंटी बजाते हैं, मंत्रों का उच्चारण करते हैं, पर्दा बंद करते हैं। लेकिन जब पर्दा खोलते हैं, तो सारी सामग्री वैसी ही होती है। एक दाना भी कम नहीं हुआ होता। तो क्या कृष्ण वास्तव में भोग खाते हैं?”
गुरुजी ने कहा, “कृष्ण हमारे जैसे भौतिक तरीके से भोजन नहीं करते। हम भोजन को हाथ से उठाकर मुँह में डालते हैं, चबाते हैं और निगलते हैं। लेकिन कृष्ण उस तरह नहीं खाते। वे अपनी दिव्य दृष्टि से भोग को स्वीकार करते हैं।”
बच्चा यह सुनकर और भी उलझ गया।
उसने पूछा, “लेकिन कोई अपनी आँखों से कैसे खा सकता है? हम तो मुँह से खाते हैं, आँखों से नहीं!”
गुरुजी ने समझाया, “कृष्ण का भोजन करना आध्यात्मिक होता है। वे हमारी तरह स्थूल और प्रत्यक्ष रूप से भोजन नहीं करते।”
बच्चे ने कहा, “लेकिन अगर कृष्ण ने सच में भोग खाया है, तो थाली खाली होनी चाहिए। अगर भोजन थाली में वैसे ही रखा है, तो हम कैसे समझें कि कृष्ण ने उसे स्वीकार किया?”
गुरुजी ने कहा, “ठीक है, मैं तुम्हें इसका उत्तर दूँगा। तुम घर जाओ और इस श्लोक को अच्छी तरह याद करो। फिर मैं तुम्हें समझाऊँगा।”
अगले दिन सभी बच्चे कक्षा में आए। गुरुजी ने पूछा, “क्या तुमने श्लोक याद कर लिया?”
जिस बच्चे ने प्रश्न पूछा था, उसने बहुत सुंदर ढंग से पूरा श्लोक सुना दिया।
गुरुजी ने पूछा, “तुमने यह श्लोक कहाँ से सीखा?”
बच्चे ने कहा, “गुरुजी, मैंने इसे पुस्तक से सीखा।”
गुरुजी ने पूछा, “तुमने इसे कैसे याद किया?”
बच्चे ने कहा, “पहले मैंने पुस्तक देखकर बार-बार श्लोक पढ़ा। फिर पुस्तक बंद कर दी और बिना देखे उसे दोहराता रहा। इस तरह धीरे-धीरे श्लोक मेरी स्मृति में आ गया।”
गुरुजी ने पूछा, “तो क्या अब यह श्लोक तुम्हारी स्मृति में है?”
बच्चे ने कहा, “जी हाँ, गुरुजी।”
गुरुजी ने पूछा, “तो क्या अब वह श्लोक पुस्तक से गायब हो गया?”
बच्चे ने तुरंत पुस्तक खोली और कहा, “नहीं गुरुजी, श्लोक तो पुस्तक में भी है।”
तब गुरुजी ने कहा, “जब एक ही श्लोक पुस्तक में भी रह सकता है और तुम्हारी स्मृति में भी, तो फिर तुम्हें इस बात पर आश्चर्य क्यों होता है कि भोग थाली में भी रह सकता है और कृष्ण उसे अपने दिव्य रूप में स्वीकार भी कर सकते हैं?”
“जिस प्रकार श्लोक पुस्तक से तुम्हारी स्मृति में एक सूक्ष्म रूप में प्रवेश करता है और फिर भी पुस्तक में मौजूद रहता है, उसी प्रकार कृष्ण भी भोग को एक सूक्ष्म और आध्यात्मिक रूप में स्वीकार करते हैं। इसलिए भोग की मात्रा थाली में दिखाई देती रहती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भगवान ने उसे स्वीकार नहीं किया।”
ब्रह्माजी भी ब्रह्मसंहिता में भगवान के दिव्य स्वरूप का वर्णन करते हुए कहते हैं—
"अङ्गानि यस्य सकलेन्द्रियवृत्तिमन्ति पश्यन्ति पान्ति कलयन्ति चिरं जगन्ति। आनन्दचिन्मयसदुज्ज्वलविग्रहस्य गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥"
“मैं उन आदि पुरुष भगवान गोविन्द की भक्ति करता हूँ, जिनका दिव्य शरीर पूर्णतः आनंद और चेतना से परिपूर्ण है। उनके शरीर का प्रत्येक अंग सभी इन्द्रियों के कार्य करने में समर्थ है। अर्थात, भगवान केवल अपने मुख से ही नहीं, बल्कि अपने किसी भी अंग से किसी भी इन्द्रिय का कार्य कर सकते हैं।”

इसलिए हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि भगवान ने भोग स्वीकार किया या नहीं, केवल इसलिए कि थाली में भोजन पहले जैसा दिखाई दे रहा है। भगवान को भोग लगाते समय सबसे महत्वपूर्ण है—भक्ति, प्रेम और श्रद्धा।
