"विद्वान और नाविक"
एक बार एक बहुत बड़ा विद्वान (पंडित) एक नदी पार करने के लिए एक साधारण नाविक की नाव में बैठा। नाव अपनी गति से चलने लगी।
विद्वान को अपनी पढ़ाई-लिखाई और ज्ञान पर बहुत घमंड था।नाविक को चुपचाप नाव चलाते देख, विद्वान ने अपना रोब झाड़ने के लिए उससे पूछा, "क्या तुमने कभी खगोल विज्ञान (Astronomy) पढ़ा है? क्या तुम जानते हो कि तारे और ग्रह कैसे काम करते हैं?"
नाविक ने बड़ी विनम्रता से सिर झुकाकर कहा, "नहीं बाबूजी, मैं तो एक अनपढ़ नाविक हूँ। मैंने यह सब कभी नहीं पढ़ा।"विद्वान हंसते हुए बोला, "अरे! तब तो तुम्हारी जिंदगी का २५% (एक चौथाई) हिस्सा बेकार चला गया!"
कुछ देर बाद विद्वान ने फिर पूछा, "अच्छा, क्या तुमने कभी भूविज्ञान (Geology) या इतिहास पढ़ा है? "नाविक ने फिर कहा, "नहीं बाबूजी, मुझे इन सब का कोई ज्ञान नहीं है।"विद्वान ने उपेक्षा से कहा, "तुमने अपनी जिंदगी का ५०% (आधा) हिस्सा बिल्कुल बर्बाद कर दिया!
"नाव जब नदी के बीचों-बीच पहुँची, तो विद्वान ने फिर पूछा, "क्या तुमने कभी मनोविज्ञान (Psychology) या तर्कशास्त्र (Logic) सीखा है? "नाविक ने दुखी होकर कहा, "नहीं बाबूजी, मैं तो बस नाव चलाना जानता हूँ।"
"विद्वान ने ताना मारते हुए कहा, "तब तो तुम्हारी ७५% जिंदगी पूरी तरह बेकार चली गई। तुमने जीवन में कुछ नहीं सीखा।
"तभी अचानक मौसम बदला और एक भयानक तूफान आ गया। नदी में ऊँची-ऊँची लहरें उठने लगीं और नाव में पानी भरने लगा। नाव किसी भी पल डूबने वाली थी।
अब नाविक ने विद्वान से पूछा, "बाबूजी, क्या आपको तैरना आता है? "विद्वान घबराकर कांपते हुए बोला, "नहीं! मुझे तैरना नहीं आता!"नाविक मुस्कुराया और नाव से नदी में कूदते हुए बोला, "बाबूजी, तब तो आपकी १००% जिंदगी बेकार चली गई, क्योंकि मुझे तो तैरना आता है और मैं अपनी जान बचा लूंगा, लेकिन आपका सारा ज्ञान आज आपको डूबने से नहीं बचा पाएगा।"

श्रील प्रभुपाद इस कहानी के माध्यम से दो बेहद महत्वपूर्ण बातें सिखाते हैं:
शिक्षा - व्यावहारिक और आध्यात्मिक ज्ञान ही असली ज्ञान है। हम भौतिक संसार में चाहे कितनी भी डिग्रियां या सांसारिक ज्ञान (इतिहास, विज्ञान, गणित) इकट्ठा कर लें, अगर हमें जीवन के असली संकट—जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और बीमारी—से पार पाना नहीं आता, तो वह सारा ज्ञान व्यर्थ है। सांसारिक ज्ञान अक्सर मनुष्य के भीतर अहंकार पैदा करता है। नाविक सरल था और उसके पास जीवन रक्षा का व्यावहारिक ज्ञान था। इसी तरह, एक सरल भक्त भले ही सांसारिक रूप से पढ़ा-लिखा न हो, लेकिन यदि उसके पास भगवान की भक्ति का ज्ञान है, तो वह संसार रूपी सागर को आसानी से पार कर जाता है।
