एक सुहावनी शाम थी, और हॉल हँसी से भरा हुआ था। मेहमान एक जन्मदिन की पार्टी के लिए इकट्ठे हुए थे। सब बहुत उत्साहित थे, तभी मेज़बान ने ताली बजाई और कहा, "चलो, एक खेल खेलते हैं!" उसने हर व्यक्ति को एक चमकदार लाल गुब्बारा दिया और कहा, "इस पर अपना नाम लिखो।" जल्द ही हॉल उन गुब्बारों से भर गया जिन पर सभी तरह के नाम लिखे थे - बड़े अक्षरों में, टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में, मज़ेदार अक्षरों में। जब नाम लिख लिए गए, तो मेज़बान ने अगला निर्देश दिया: "अब अपने गुब्बारे छोड़ दो!" गुब्बारे ऊपर चले गए - तैरते हुए, उछलते हुए, लहराते हुए, जब तक कि पूरी छत लाल गुब्बारों से चमकने नहीं लगी। फिर आई चुनौती। मेज़बान मुस्कुराते हुए बोला, "तुम्हारा काम है, अपने नाम वाला गुब्बारा ढूँढना!" सभी उत्साह में इधर-उधर भागने लगे। कुछ लोग उछले, एक गुब्बारा नीचे खींचा। "ओह नहीं, यह मेरा नहीं है," एक ने कहा और उसे छोड़ दिया। दूसरे ने जल्दी से एक गुब्बारा पकड़ा। "यह भी मेरा नहीं है!" वह आह भरते हुए उसे वापस भीड़ में छोड़ दिया। कमरा लाल गुब्बारों के ऊपर-नीचे उड़ने से अस्त-व्यस्त हो गया। जितना ज्यादा वे खोजते, उतने ही ज्यादा भ्रमित होते गए। किसी को भी अपना गुब्बारा नहीं मिल रहा था। तभी एक बुद्धिमान बुजुर्ग व्यक्ति, जो चुपचाप देख रहा था, खड़ा हुआ और हाथ उठाया। "एक पल के लिए रुको," उसने धीरे से कहा। "मैं तुम्हें इस खेल का रहस्य बताता हूँ।" कमरे में सन्नाटा छा गया। सब सुनने के लिए आगे झुके। "अपना खुद का गुब्बारा मत ढूँढो," उसने समझाया। "इसके बजाय, जो पहला गुब्बारा मिले उसे उठा लो। उस पर लिखा नाम देखो। फिर उस व्यक्ति को ढूँढो और उसे दे दो। अगर तुम किसी की मदद करोगे, तो कोई और तुम्हारी मदद जरूर करेगा। और जल्द ही, तुम्हारा गुब्बारा खुद तुम्हारे पास वापस आ जाएगा।" मेहमानों ने सिर हिलाया, और एक-एक करके उन्होंने सलाह का पालन किया। एक छोटी बच्ची ने एक गुब्बारा उठाया और पढ़ा, "अनीता।" वह दौड़कर गई और उसे अनीता को दे दिया, जो खुशी से मुस्कुरा उठी। अनीता ने फिर एक गुब्बारा ढूँढा जिस पर "रवि" लिखा था और जल्दी से उसे दे दिया। रवि को "मीना" का गुब्बारा मिला और उसने उसे वापस कर दिया। हॉल अब फिर से हँसी से भर गया था लेकिन इस बार, उलझन से नहीं, बल्कि खुशी से। कुछ ही देर में, हर एक व्यक्ति के हाथ में सुरक्षित रूप से अपना खुद का गुब्बारा था। बुद्धिमान व्यक्ति मुस्कुराया और बोला, "देखा? खुशी भी ऐसे ही काम करती है। अगर तुम केवल अपनी ही खुशी के पीछे भागोगे, तो शायद तुम्हें वह कभी नहीं मिलेगी। लेकिन जब तुम दूसरों को खुश करते हो, तो खुशी खुद तुम्हारे पास लौटकर आती है।" कमरा सहमति की तालियों से गूँज उठा।
जैसे हमारे वैदिक शास्त्र कहते हैं, हमें प्रार्थना करनी चाहिए - *"ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः"* (सभी सुखी हों) *"सर्वे सन्तु निरामयाः"* (सभी रोगमुक्त रहें) *"सर्वे भद्राणि पश्यन्तु"* (सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें) *"मा कश्चिद् दुःख भाग्भवेत्"* (किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े) *"ॐ शांति, शांति, शांति"* (शांति, शांति, शांति हो)
सच्चा आनंद अपनी खुद की खुशी के पीछे भागने से नहीं, बल्कि दूसरों में खुशी बाँटने से मिलता है। जब तुम दूसरों को ऊपर उठाते हो, तो तुम खुद भी ऊपर उठ जाते हो।
