एक जंगल में एक कौआ रहता था। खुले आसमान में उड़ना और अपनी मस्ती में जीना ही उसका स्वभाव था; उसे किसी चीज़ की कोई कमी नहीं लगती थी।
एक दिन उसने झील के शांत पानी में तैरते हुए एक दूध जैसे सफेद हंस को देखा।
कौए ने अपने काले रंग को देखा और मन ही मन उदास होकर सोचा, "मैं कितना काला और कुरूप हूँ, और यह हंस कितना उज्ज्वल और सुंदर है! सचमुच, यह इस संसार का सबसे सुखी और भाग्यशाली प्राणी होगा।"
कौआ उड़कर हंस के पास पहुँचा और बोला, "हंस भाई! तुम कितने सुंदर और निष्कलंक हो। तुम तो दुनिया के सबसे सुखी पक्षी होगे ना?"
हंस ने एक गहरी सांस ली और कहा, "नहीं मित्र, जब तक मैंने तोते को नहीं देखा था, तब तक मैं भी ऐसा ही सोचता था। पर तोते के पास दो-दो सुंदर रंग हैं—हरे पंख और लाल चोंच! मेरे पास तो सिर्फ एक सादा सफेद रंग है। सच कहूँ तो तोता ही दुनिया का सबसे सुखी पक्षी है।"
कौआ तोते की खोज में आगे बढ़ा। एक पेड़ की डाल पर उसे तोता मिल गया। कौआ बोला, "तोते भाई! तुम्हारे चटख हरे पंख और लाल चोंच कितनी मनमोहक हैं। तुम कितने आनंद में रहते होगे!"
तोते ने दुखी स्वर में उत्तर दिया, "कौए भाई, मुझे भी अपने रंगों पर बड़ा गर्व था, जब तक कि मैंने मोर को नहीं देखा। मोर के पंखों में तो प्रकृति के अनगिनत और चमकीले रंग सजे हैं।
उसकी सुंदरता के आगे मेरी कोई गिनती नहीं। वही सबसे सुखी है।"
अब कौआ मोर की तलाश में शहर के एक चिड़ियाघर में पहुँचा।
उसने देखा कि मोर के बाड़े के बाहर सैकड़ों लोगों की भारी भीड़ जमा थी। लोग उसकी सुंदरता देखकर तालियाँ बजा रहे थे और तस्वीरें खींच रहे थे।
शाम को जब दर्शक चले गए और सन्नाटा छा गया, तो कौआ मोर के पिंजरे के पास गया और बोला, "हे सुंदर मोर! तुम्हारे पास इतने दिव्य पंख हैं, पूरी दुनिया तुम्हारी एक झलक पाने के लिए तरसती है। ईश्वर ने तुम्हें इस धरती का सबसे सुंदर और सुखी पक्षी बनाया है।"
मोर की आँखों में आँसू आ गए। उसने भारी मन से कहा, "कौए भाई, मुझे भी लगता था कि मैं सबसे सुंदर हूँ। लेकिन मेरी इसी सुंदरता ने मेरी आज़ादी छीन ली। मुझे इस लोहे के पिंजरे में उम्र भर के लिए कैद कर दिया गया है।"
मोर ने आगे कहा, "मैंने इस चिड़ियाघर को बहुत ध्यान से देखा है। यहाँ शेर, चीते, तोते, हंस सब पिंजरों में बंद हैं, लेकिन मैंने कभी किसी कौए को पिंजरे में बंद नहीं देखा। तुम्हारी कोई नुमाइश नहीं लगाता, तुम्हें कोई कैद नहीं करता।
काश! मैं तुम्हारी तरह एक कौआ होता, तो आज खुले आसमान में अपनी आज़ादी की उड़ान भर रहा होता। सच तो यह है कि इस दुनिया में सबसे स्वतंत्र और सुखी तुम हो!"
मोर की बात सुनकर कौए की आँखें खुल गईं। उसने पहली बार अपने काले पंखों को गर्व से देखा।
वह समझ गया कि दूसरों से तुलना करना ही सारे दुखों की जड़ है, और ईश्वर ने उसे जैसा बनाया है, वही उसके लिए सबसे उत्तम है।
आध्यात्मिक संदेश और संतों की वाणी इस शाश्वत सत्य को संत कबीरदास जी ने अपने अमर दोहे में बहुत सुंदरता से व्यक्त किया है:
गोधन गजधन बाजिधन, और रतनधन खान। जब आवै संतोष धन, सब धन धूरि समान ॥
अर्थात, किसी के पास गाय, हाथी, घोड़े या हीरों-मोतियों की खदानों जैसा अपार भौतिक वैभव ही क्यों न हो, जब जीवन में 'संतोष' रूपी सच्चा धन आ जाता है, तो बाकी सभी संपदाएं और तुलनाएं धूल के समान तुच्छ हो जाती हैं।
स्वयं भगवान श्री कृष्ण भी श्रीमद्भगवद्गीता (१२.१४) में बताते हैं कि वास्तविक शांति और उनका प्रिय बनने का मार्ग क्या है:
"सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥"
जो व्यक्ति हर परिस्थिति में निरंतर संतुष्ट रहता है (सन्तुष्टः सततं), मन और इंद्रियों को संयमित रखता है, दृढ़ संकल्प के साथ भक्ति में लगा है और जिसका मन तथा बुद्धि मुझमें समर्पित है—ऐसा भक्त मुझे अत्यंत प्रिय है।
यदि हम जीवन में वास्तविक सुख पाना चाहते हैं और ईश्वर के प्रिय बनना चाहते हैं, तो हमें दूसरों से होड़ और तुलना छोड़कर, प्रभु द्वारा दिए गए वर्तमान स्वरूप और परिस्थिति में पूर्ण संतुष्ट रहकर कृतज्ञता का जीवन जीना चाहिए।

